फिर आना अम्मा

फिर आना अम्मा

स्मृति आख्यान

जब हम खुद को समेटने लगते हैं; सपने, शकलें, हसरतें, सरहदें, महफिलें, आवाजें, शख्सियतें धीरे-धीरे इस तरह पीछे छूटने लगती हैं कि लगता नहीं ये सब कभी हमारे जीवन का हिस्सा थे। हम एकाएक खुद को तन्हा, खाली, एकाकी पाते हैं। आस-पास सन्नाटा होता है या आँधियाँ। व्याधियों, दवाइयों, दर्द के साथ बड़े हौसले से अपने ये अंतिम आठ-नौ बरस गुजार कर अम्मा तुम अब अपनी साँसों को समेट रही हो। जितने रोग उतनी तादाद में दवाइयाँ। खाते हुए सुबह से शाम हो जाती है। तुम कहती हो अब तो इतना दर्द है कि पता नहीं चलता कितना है। अम्मा, तुमने दर्द के साथ जीने की आदत डाल ली है। इसीलिए कभी-कभी दवाई नहीं खाती हो कि दर्द जाता नहीं तो दवाई का क्या अर्थ? ‘‘हरपीज हमारे चरनन (प्राण लेने) आया है। वैसे भी अस्सी, बयासी के हुए। अमर न हो जाएँगे।’

अर्थात तुमने दर्द के दखल को जीवन का हिस्सा मान लिया है! अस्पताल जैसे बड़े और ऊँचे लोहे के घिर्रीदार पलंग पर अंतिम साँसें समेट रही हो। जब बैठना चाहती हो घिर्री घुमा कर पलंग को सिराहने से उठा दिया जाता है। तुम बैठ कर अच्छा महसूस करती हो और सबको अचरज में डाल हँस भी लेती हो ‘व्हील चेयर ला दो तो हमारा कमरा अस्पताल बन जाए। दर्द को तो अब जाना नहीं है।’

अम्मा मुझे लग रहा है तुम अपनी साँसों को ही नहीं समेट रही हो, बहुत कुछ समेट रही हो। एक शख्सियत इस धरा से विदा लेती है तो उसके साथ एक युग, साम्राज्य, सत्ता, हुनर, तौर-तरीके, अनुभव, सूचनाएँ…बहुत कुछ विलुप्त हो जाता है। जैसे-जैसे तुम अपनी साँसों को समेट रही हो, तुम्हें लेकर चिंता…बल्कि मोह बढ़ता जा रहा है। बरसों-बरस अपनी गृहस्थी, बच्चों में ऐसी व्यस्त रही कि कम ही ख्याल आया तुम्हें अपने होने का एहसास! वही समीपता और सांत्वना दूँ जो तुमने अपने सात बच्चों और ग्यारह नाती-नातिनों को दी है। यह एक मेरा ही नहीं, सभी का सच है। यही कि अतीत की अपेक्षा, भविष्य को सार्थक करने का चाव और चिंता इतनी घनीभूत हो जाती है कि हम अपने बच्चों को स्नेह, स्पर्श, समीपता देते हुए अक्सर बिसरा देते हैं यही भावना संवेदना माता-पिता ने हमें दी होगी। बिसरा देते हैं, इसलिए अपने बच्चों को जिस शिद्दत से प्रेम करते हैं, माता-पिता को नहीं करते। जबकि जानते हैं माता-पिता ने हमें जितना प्रेम दिया, कोई नहीं दे सकता। जबकि जानते हैं हमारे बच्चे, ठीक हमारी  तरह अपने बच्चों को अधिक प्रेम करेंगे, हमें नहीं। जबकि जानते हैं, तैयार होकर बच्चे अपना एक अलग, जीवन साथी और बच्चों वाला परिवार बना लेंगे। उस परिवार में उन माता-पिता के लिये जगह नहीं होगी जिनके परिवार में ये जन्मे हैं। तुम्हें अपनी साँसों को समेटते देख अचानक एक बहुत बड़े सच से सामना हो रहा है अम्मा। यही कि माता-पिता का सम्यक् मूल्यांकन उनके न रहने अथवा उनसे दूर जा बसने पर होता है। शायद इसीलिए शादी के बाद बेटियाँ अपनी माँ से अधिक जुड़ जाती हैं। इतनी कि दुःख-व्यथा में सबसे पहले माँ ही याद आती है। मैं जब से परेशान हुई तुम याद आती थी। सबसे अधिक याद आती थी तुम्हारी आँखें। विवाह के बाद हम बहनों को विदा करते हुए, सूप थाम कर परछन करती। तुम और झम-झम बरसती तुम्हारी आँखें। बरसती आँखों में परिवार के एक सदस्य के पराये होने की पीड़ा तो होती ही थी और होता था पछतावा कि मुनासिब दहेज न दे सकने से विवाह उस तरह नहीं हो सका जिस तरह तुम चाहती थी। आज हम सभी बहनों ने अपना स्तर बना लिया है अम्मा, पर वे दिन बहुत उदासी भरे थे। लेन-देन की बात न जम पाने से बाबूजी लड़के वालों के दर से निराश लौटते थे। मैं कहती ‘अम्मा, हम पाँच न होकर एक या दो होतीं तो लड़के वाले तुम लोगों को इस तरह निराश न करते।’

तुम पछतावे से भर जाती ‘ऐसा मत कहो। तुम सब अपना भाग्य लेकर जन्मी हो। जिस घर से भाग्य बँधा होगा, आसानी से बात बन जाएगी।’

कठिन परिस्थिति में भी तुमने उम्मीद नहीं छोड़ी। अब छोड़ रही हो। धीरे-धीरे। चुक रही हो। धीरे-धीरे नहीं, तेजी से। सन् 1994 में जब बाबूजी नहीं रहे, हम सबके भीतर स्याह अँधेरा उतरा था फिर भी, तुम अभी हो यह बोध मानस को मजबूत किये हुए था। तुम हो इसलिए रीवा (मायका) आने-जाने के मौके बने रहेंगे। मायका सही अर्थों में तब तक ही है, जब तक माँ है। फिर सब खत्म या औपचारिक हो जाएगा। समाजशास्त्रियों की चतुराई देखते ही बनती है। पैतृक घर विवाह के बाद बेटी के लिये भले ही मायका (माँ का घर) हो जाए पर वह घर वास्तविक अर्थ में पूरी तरह माँ का कभी नहीं होता। सत्ता पुरुष की ही चलती है। यहाँ भी अम्मा महत्त्वपूर्ण फैसले बाबूजी ने किये। उनके बाद तुम्हारे दोनों बेटे करने लगे। लेकिन हम बहनों को इस घर से जोड़ने वाली मजबूत कड़ी तुम हो। तुम नहीं रहोगी तो एक बड़ा शून्य उभरेगा, जो रीवा आने के मौके ही नहीं एक रिश्ता भी खत्म कर देगा। वैसे तो व्यक्ति चला जाता है, रिश्ता तब भी बना रहता है पर अमूत्र्त हो जाता है।

ठीक शाम छह बजे तुम्हारे सेल फोन पर कॉल करना पता नहीं कब मेरी दैनंदिनी में शुमार हो गया। शायद जब से तुम बिस्तर पर अपना समय बिताने लगी। तुम कहती हो मेरे कॉल की प्रतीक्षा में तुम्हारी शाम सार्थक हो जाती है। कॉल तुम्हे ऊर्जा देता है। सोच कर तुम्हें अच्छा लगता है सात संतानों में कोई तुम्हें इस पाबंदी से याद करता है। सुन कर दिल भर आता है अम्मा। तुम्हारे लिये और तुम्हारी सहनशक्ति के लिये। भगवान भी शायद तुम्हारी सहनशक्ति की सीमा देखना चाहते हैं। तुम्हारी आदत है तकलीफ न बताने की और घर के लोग मान लेते हैं तुम्हें कोई तकलीफ नहीं है। इसीलिए आठ-नौ साल पहले मधुमेह के लक्षण जब पूरी ढिंठाई से सामने आ गए तब जाँच हुई। तुम एक्यूट डायबिटिक पाई गई। खाने के पूर्व दोनों वक्त इंजेक्शन से इंसुलिन का हाई डोज दिया जाने लगा। हाथ-पैर में सुई के असंख्य चिन्ह। पाँच साल हुए, दिल्ली के एस्कार्ट्स हार्ट रिसर्च सेंटर में हार्ट सर्जरी हुई। एक वाल्व बदला गया। एक रिपेयर हुआ। एस्कार्ट्स के कार्डियोलाजिस्ट डॉ. युगल किशोर मिश्रा का गाँव जरियारी और तुम्हारा पैतृक गाँव डुड़हा, अमरपाटन तहसील में। तुम डॉक्टर साहब की बुआ जी हो गई। डॉ. मिश्राके व्यवहार में गजब की नैतिकता है। तुम्हें उन पर ऐसा विश्वास हो गया है कि सोचती हो हरपीज वही ठीक कर सकते हैं। तुम लगभग दो साल से हरपीज से जूझ रही हो। और अभी ठीक दो माह पहले बाथरूम में फिसल गई। अंदरुनी मसका चोट के कारण कमर और पसलियों में भीषण दर्द। कमर में प्लास्टर नहीं बाँधा जा सकता। तुम घिर्री वाले बिस्तर पर पड़ी रहती हो। मैंने तुम्हें इस तरह बिस्तर पर कभी नहीं देखा। मेरी याद में तुम्हें एक बार मलेरिया हुआ और एक बार फटाका (अम्मा तुम्हारा विकट गउ प्रेम, गाय के बिना तुम्हें चैन न था। पता नहीं घर लाई गई पहली गाय कौन थी जिसकी पता नहीं कौन-सी पीढ़ी आज भी पल रही है। एक गाय मरकही थी। तुमने उसका नाम फटाका रख दिया था।) ने तुम्हारी आँख के ऊपर ठीक भृकुटी में सींग मार दी थी। तेज रक्त बहा था। मरहम-पट्टी के लिये तुम अस्पताल गई थी। और अब व्याधि, दर्द, दवाई …। फिर भी साहस से रह रही थी। हरपीज ने हौसले तोड़ दिये। मैं हरपीज के बारे में इतना ही जानती थी असहनीय दर्द वाली यह नसों की बीमारी उपचार के बावजूद ठीक होने में लंबा वक्त लेती है। ठीक होने के उपरांत भी दर्द का एहसास पूरी तरह नहीं जाता। अम्मा तुम्हारा दर्द और चेहरा देख कर मैं जर्द हो गई थी। बाँये आधे भाल, कपोल, आँख के चौगिर्द त्वचा गहरे लाल बल्कि कत्थई छोटे-छोटे चकत्तों से भरी हुई। तुम वस्तुतः खूबसूरत रही हो। तुम्हारे चेहरे को ये क्या हो गया? दर्पण में तुमने यदि अपना चेहरा देखा होगा तो…। हम जिसे सदा खूबसूरत देखते हैं उसके चेहरे में कोई नुक्स आ जाए तो तत्परता से पकड़ में आ जाता है। जिसे खूबसूरत नहीं देखा उसके चेहरे के बदलाव कम नजर आते हैं। एस्कार्ट्स में एक-दो लेडी डॉक्टर और नर्सों ने कहा था ‘श्रीमती पांडेय आप इस उम्र में भी खूबसूरत है।’ शादी अवसर में आये दोनों बड़े मामा और बड़ी मौसी यही कहती थी ‘केसर, अब भी सुंदर लगती है। तब तो वहीदा रहमान लगती थी।’

हमलोग कल्पना नहीं कर पाते थे स्निग्ध त्वचा, छरहरे लंबे कद के कारण युवावस्था में तुम वहीदा रहमान लगती रही होंगी। हमलोग को संदेह से हँसते देख मौसी जोर देकर कहतीं–‘माँ-बाप सुंदर हों, तभी बच्चे सुंदर होते हैं। केसर सुंदर न होती तो तुम लोग देखने योग्य न होती। अपने बाबूजी को तो देख ही रही हो।’

हाँ अम्मा, तुम्हारे मुकाबले बाबूजी औसत। पर उनके प्रभावशाली पद (जिला व सत्र न्यायाधीश, फिर सेवानिवृत्त हो लोकायुक्त बनाये गए), उनकी ईमानदार कर्मठ छवि, न्याय करते उनके नीर-क्षीर विवेक से उनका जो प्रभा मण्डल बनता था वह उनकी शख्सियत को शानदार बनाता था। लेकिन हरपीज ने अम्मा तुम्हारे चेहरे को क्या बना दिया? बाँये चेहरे में निरंतर बनी रहने वाली तीक्ष्ण जलन और पीड़ा। आँख में मानो मिर्च पाउडर झोंक दिया गया है। चौबीस घंटे में अचानक कभी भी दो या तीन बार, डेढ़-दो मिनट के लिये सिर व चेहरे की नसों में तेज दर्द का आक्रमण सा होता। जैसे विद्युत धारा प्रवाहित की जा रही हो। जैसे नसें चटक रही हों। अम्मा तुम सिर थाम कर दर्द भरी कातर आवाज में चिल्लातीं। तुम्हारी दीनता और दहशत देख हमलोग कुछ न कर सकते थे सिवाय कमजोर सा आश्वासन देने के–‘अम्मा, तुम ठीक हो जाओगी।’

‘यह बीमारी हमारे चरनन आई है।’

मैं बताती ‘सेल्स टैक्स के एक बाबू को हरपीज हुआ था। तभी मुझे मालूम हुआ यह भी कोई बीमारी होती है। चार-छह महीने में उन्हें आराम मिल गया। तुम ठीक हो जाओगी।’

‘बाबू की उम्र क्या है?’ दर्द की तीक्ष्णता दर्शाती तुम्हारी आवाज।

‘पैंतालीस-पचास।’

‘तभी ठीक हो गए। हमारी उम्र बहुत है। अब साथ ही जाएगा।’

‘अम्मा तुमने ठीक कहा था। इस दशहरे में तुम्हारे हरपीज को दो साल हो गए। झनझनाहट भरा आक्रमण नहीं होता पर बाईं ओर जलन, दर्द बना रहता है। आँखों से धुँधला दिखता है दो साल होने आये, शाम को कॉल करते हुए मैं आशंकित रहती हूँ कि आज तुम पता नहीं किस स्थिति में हो। जब बाबूजी डायलिसिस पर थे तब भी टेलीफोन पर आने वाली लंबी रिंग हाड़-माँस सुखा देती थी कि…। अम्मा मुझे याद है। उनतीस जनवरी 1994, जाड़ा जोरों पर था और बाबूजी की वह अंतिम साँझ थी। तुम्हारी अंतरात्मा ने तुम्हें संदेश दिया अथवा बाबूजी की इच्छा शक्ति प्रबल थी। आसन्न विपत्ति का अनुमान लगा तुम उन दिनों बौखलाई रहती थी लेकिन उस दिन लाल रंग की साड़ी पन कर अस्पताल पहुँची थी कि लाल रंग जो इतना पसंद है अब पहनने को मिले, न मिले। बाबूजी ने भी चाहा हो, लाल साड़ी में तुम्हारी खूबसूरती बढ़ जाती है, तो फिर पहनो, न पहनो, आज पहन लो। बाबूजी को गए बीस साल हो गए अम्मा। तुमने अकेले दम पर अपने दायित्व खूब निभाये। कभी माँ बन कर, कभी पिता बन कर। बाबूजी न्यायाधीश फैसला करते-करते न्याय विभाग की गंभीरता और सतर्कता उनके आंतरिक और बाह्य स्वभाव में आ गई थी कि सही फैसला करना है तो जमाने से निस्पृह होकर रहना होगा। वे घर में भी न्यायाधीश की तरह कड़क होते थे। मुझे याद नहीं उन्होंने कभी हुलस कर हम लोगो को स्पर्श किया हो। कभी माँ बन कर, कभी पिता बन कर तुम हमलोग को स्पर्श और समीपता देती रही हो। सच कहूँ अम्मा, माता-पिता जैसा संबंध दूसरा नहीं होता। स्त्री-पुरुष पहले पति-पत्नी बनते हैं फिर माता-पिता लेकिन संतान की नजर में वे सिर्फ माता-पिता होते हैं जिनका पति-पत्नी के तौर पर आपस में वास्तव नहीं होता। मैं अब खुद को भी इसी नजर में देखने लगी हूँ। लगता है मैं जन्म से ही बेटे हर्षद और बेटी कामायनी की माँ हूँ। ये दोनों अपने जन्म से नहीं,मेरे जन्म से मेरे साथ हैं। अब तक मालूम नहीं था लेकिन अब लगता है अम्मा, हर बेटी धीरे-धीरे खुद को उन स्थिति-परिस्थिति से जुड़ा हुआ पाने लगती है जिनसे उनकी माँ कभी गुजरी होगी। मैं जब-जब परेशान हुई तुम्हारी बहुत सी परेशानियाँ याद आईं। तब तुम्हारी परेशानियों को सुनने का धीरज या शायद तमीज हम भाई-बहनों में नहीं थी। लगता था तुम पता नहीं किस माहौल की बात करती हो। हमलोग से पता नहीं क्या चाहती हो। अब समझ पाती हूँ थोड़ा सा फेवर चाहती थी। सतना से रीवा की कुल दूरी साठ किलोमीटर। यह दूरी तय कर अब मैं तुम्हें देखने अक्सर आती हूँ। मिल कर उसी दिन लौटती हूँ या तुम्हारे आग्रह पर एक-दो दिन रुक जाती हूँ। जिम्मेदारियाँ रहीं पर पारिवारिक बंधन या मेरी लापरवाही, मैं रीवा बहुत कम आती थी। संयोगवश छह भाई-बहन स्थायी तौर पर रीवा में बसे हैं। दोनों भाई श्रीनाथ और गुड्डू व मुझसे  ढाई साल बड़ी अविवाहित शिक्षिका बहन (पोलियोग्रस्त पैर के कारण विवाह न हुआ) तुम्हारे साथ रहती है। तीन बहनें अलग कालोनियों में। तुम मुझसे अक्सर कहती थी–‘तुम तो सतना की हो गई। कभी आ जाया करो।’

‘केस मिलने के इंतजार में ये पूरा दिन अपने चैंबर (किराये की छोटी दुकान) में बैठते हैं अम्मा। प्रैक्टिस चल नहीं रही है। दो छोटे बच्चे। रोज कमाने रोज खाने जैसी स्थिति ने बुद्धि कुंद कर दी है। कहीं आने-जाने की सुध तक नहीं रहती।’

तुम उम्मीद बँधाती ‘अपने हिस्से का संघर्ष सबको करना पड़ता है। जिसे कुछ नहीं मिला उसे कुछ पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। जिसे माता-पिता का दिया मिल गया उसे उस मिले हुए को बनाये रखने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। संघर्ष करने से एक दिन सब ठीक हो जाता है।’

मैं जब विवाह के बाद सतना आई मेरे पति मुनीन्द्र मिश्र को टैक्सेशन की प्रैक्टिस करते हुए मात्र तीन माह हुए थे। जब ग्यारह माह के थे प्रसव में शिथिल हुई उनकी माँ साथ छोड़ गई। नई माँ का आगमन। त्रासद बचपन, परिवार से समर्थन न मिला। संघर्ष हमें अपने बूते करना था जो बरसों चला। (इस पर फिर कभी लिखूँगी)। संघर्ष ने मुझे बहुत निराश नहीं किया था क्योंकि मैं बहुत सादे-संयमित वातावरण में पली-बढ़ी। पैसा नहीं, दिखावा नहीं, आज भी मेरा जीवन साधारण है। मैं बहुत कम में भी संतोष कर लेती हूँ। यह संतोष अम्मा तुमसे मेरे भीतर आया है। बाबूजी इतने ईमानदार कि सेठों, व्यापारियों, वकीलों द्वारा दीपावली पर प्रसाद के तौर पर भेजी गई मिठाई, फटाखे, सौगातें बैरंग लौटा देते–यह प्रसाद नहीं आडंबर है।’ बैरंग लौटा दी गई आकर्षक सामग्री हमलोग को अभाव से भर देती। नैतिक और अनैतिक का भेद समझाते हुए, तुम हमलोग को शीतलता देती। रसगुल्ला, बेसन बर्फी, खुरमे, नमकीन बना कर, नई ड्रेस सिल कर त्योहार मनाने के लिये उत्साहित करती। खाली वक्त में तुम्हारी सिलाई मशीन खूब चलती। फ्राक, स्कर्ट, कुर्ते तुम बड़ी सफाई से सिलती। बाबूजी और भाइयों के वस्त्र दर्जी सिलता। उन दिनों वेतन कम था। सदस्य संख्या अधिक होने के कारण और भी कम लगता था। एक हिस्सा रीवा में रह रहे नेत्रहीन बाबा, दीदी (दादी), पोस्ट ऑफिस के छोटे पद से सेवानिवृत्त हो भाँग सेवन में रत, निःसंतान कक्का, काकी के लिये भेज दिया जाता। एक निश्चित बचत कि सात बच्चों को पालना-पढ़ाना है। शेष रकम में अम्मा तुम घर चलाती थी। आज सोचती हूँ तो पाती हूँ बाबूजी इतनी जिम्मेदारी के बावजूद यदि ईमानदारी पर कायम रह पाये तो उसके पीछे तुम्हारा संतोष रहा होगा। तुम्हारे निजी एकांत का मैं नहीं जानती लेकिन खुल कर मुखर हो मैंने तुम्हें लड़ते नहीं देखा कि इस वेतन से कैसे बच्चे पढ़ेंगे और कैसे लड़कियाँ ब्याही जाएगी। अधिकारियों के बच्चों के जलवे देख हमलोग जब भी हीन हुए तुमने समझा दिया–‘ईमानदारी के कारण बाबूजी को कितनी इज्जत मिलती है। और फिर जो भी सुविधा-साधन है सब बाबूजी के कारण ही तो है। न खेती-बाड़ी है न कोई और जरिया।’

अभी चार साल पहले मालूम हुआ बाबूजी के पैतृक गाँव का नाम किटहा है। केस के सिलसिले में किटहा से आये एक लड़के ने वकालत कर रहे गुड्डू को बताया ‘किटहा में पंद्रह एकड़ खेतिहर जमीन आपके हिस्से की है। आपके परबाबा के भाई के पड़पोते अच्छी फसल काट रहे हैं।’

गुड्डू से प्रसंग सुन अम्मा तुमने न लोभ दिखाया न उत्सुकता–‘क्या पता किस परिस्थिति में तुम्हारे बाबूजी के बाबा किटहा छोड़ कर रीवा में बस गए। हमलोग को वहाँ कोई नहीं पहचानेगा। शांति से रहो। हमें हिस्सा नहीं चाहिए।’

अम्मा तुम्हारा यह संतोष और वित्त मंत्री का सा दिमाग। यद्यपि तुम मात्र चौथी पास (डुड़हा में पाठशाला कक्षा चार तक थी। पाँचवीं के लिये मुख्य पथ से लगे गाँव चोरहटा आना पड़ता था।) हो लेकिन अच्छी योजना बना कर कुशलतापूर्वक गृहस्थी चलाते हुए इतना बचाती रही कि हम बहनों के विवाह के लिये थोड़ा-थोड़ा गहना-कपड़ा जोड़ सको। तब मैं नहीं समझती थी और तुम नहीं बताती थी, साड़ियाँ खरीदती हो लेकिन पहनती क्यों नहीं हो। मर्म जाना जब हर लड़की के विवाह में बाबूजी का जी.पी.एफ. और तुम्हारी साड़ियों वाली पेटी खाली होने लगी। बाबूजी ने हमलोग को थोड़ा-बहुत जो भी दिया या नहीं दिया लेकिन अच्छी शिक्षा का भरपूर अवसर दिया। सत्त्र-अस्सी के दशक में औसत नगरों में परा स्नातक लड़कियाँ कम होती थीं। उच्च शिक्षा, विवाह के लिये आधार बनी और तुमने व बाबूजी ने जहाँ ब्याह दिया हम बहनें अपना भाग्य लेकर चली गईं। अम्मा तुम हमलोग को पढ़ने के लिये खुब प्रेरित करती थी। तुम्हें अपना अल्प शिक्षित होना हताश करता था। बाबूजी तुम्हें पार्टी-आयोजनों में कम ही ले जाते थे कि तुम्हें तौर तरीके मालूम नहीं हैं। तब पार्टी-आयोजन बहुत कम होते थे। तबादले पर विदाई भोज जरूर अच्छी संख्या में होते थे क्योंकि बाबूजी की नैतिक, ईमानदार छवि का प्रभाव जिले में बन जाता था। विभागीय लोग, वकील, जिलाधीश, पुलिस कप्तान (सेठी-व्यापारियों का आमंत्रण बाबूजी स्वीकार न करते थे।) आदि विदाई भोज देते। पैकिंग करवाने जैसी अपरिहार्य वजह से तुम न ले जाई जाती और हम में से कुछ इसलिए न ले जाए जाते कि पलटन ले जाने में शोभा नहीं दिखाई देती। तब मैं अभिप्राय समझने के योग्य नहीं थी पर मुझसे आठ साल बड़ी बहन दिद्दा अभिप्राय समझती रही होगी। उसकी खीज तुम पर निकलती ‘अम्मा, सात बच्चों को जन्म देकर तुम शोभा न बिगाड़ती।’

तुम फक्क हो गई आवाज में कहती ‘दीदी के चौदह बच्चों में सिर्फ तुम्हारे बाबूजी बचे। कक्का के संतान न हुई। सब डरे रहते थे हमारे साथ भी यही हुआ तो…।’ अम्मा तुम्हें संतान खोने की आशंका तो थी ही, पांडेय परिवार को वंशधर देने की महती जिम्मेदारी भी थी। दिद्दा फिर मझली बहन फिर मैं, फिर एक और बहन…। दीदी ने तुम्हें निपूति घोषित कर दिया। हम चार बहनों के बाद जन्मे श्रीनाथ ने तुम्हें कलंक मुक्त किया। तुम्हारी खुशी अपार। जबकि बाबूजी के सिद्धांत बड़े पक्के। जहाँ तबादला हो जाए डेरा बाँध कर चल देते थे। न तबादला कैंसिल कराने का प्रयास करते न अच्छी जगह भेजने का अनुग्रह।  श्रीनाथ दस माह का। भरी बरसात। तबादला जावद (मालवा) से सीधे सारंगगढ़ (छत्तीसगढ़)। श्रीनाथ को लेकर तुम इतनी लंबी यात्रा करने से घबरा रही थी। बस यात्रा, फिर रेल यात्रा, फिर उफान मार रही महा नदी और मान नदी को राम-राम जपते हुए तुमने और हम सबने नाव से पार किया। श्रीनाथ की उल्टियाँ बंद न हो रही थीं। बाबूजी का सुझाव-अमृत धारा चटा दो। अम्मा ये बातें अस्तित्व खो चुकी होतीं यदि तुम किस्सा गोई की तरह पुराने प्रसंग हमलोग को न बताती।

सारंगगढ़। अँग्रेजों के जमाने का बड़ा बँगला।

थोड़ी दूर पर तालाब। लाल कमल तोड़ते और मछली पकड़ते हुए चार-छह आदिवासी लड़के वहाँ मौजूद रहते। मौनी अमावस्या पर एक-दो अधिकारी पत्नियों के साथ सूर्योदय से पूर्व मौन स्नान करने तुम तालाब गई। निषेध के बावजूद मैं और मछली बहन तुम्हारे पीछे-पीछे तालाब चले आये। सीढ़ियों में पानी और फिसलन। हम दोनों बहनें फिसल कर डूबने लगीं। डुड़हा के तालाब में तैराकी सीखी तुम जल्दी-जल्दी उपक्रम कर तैरते हुए हम दोनों की फ्राकें खींचते हुए हमें बाहर निकाल लाईं। तुम्हारे मौन स्नान का बंटाधार हो गया। घटना ज्ञात होने पर दसवीं या ग्यारहवीं पढ़ रही दिद्दा ने अलग स्पष्टीकरण माँगा–

‘अम्मा, तुम इन्हें तालाब ले गई। किसी दिन ये अकेली चली जा सकती हैं। वहाँ गुंडे बैठते हैं।’

दिद्दा हमें डरा कर रखती थी अतः मैं पूछ न सकी गुंडे कैसे होते हैं। मेरी जिज्ञासा का समाधान मझली बहन ने अपने स्तर पर किया ‘नहीं जानती? गुंडों के सिर पर सींग होती है। किसी दिन छोटी गली से नहीं तालाब की तरफ से स्कूल चलेंगे। गुंडों को दूर से देख लेंगे।’

मैंने और बहन ने तालाब के कई चक्कर लगाये। हमें हर बार लड़के नजर आये। किसी के सिर पर सींग नहीं। साफ था, वे गुंडे नहीं थे। मैंने अपनी बहादुरी अम्मा तुम्हें बता दी–

‘अम्मा, तालाब जाने में खतरा नहीं है। वहाँ गुंडे नहीं, लड़के बैठे रहते हैं।’

‘डूब तो सकती हो। उधर मत जाना। दिद्दा नाराज होगी।’

मैं अचंभित होती थी। क्या दिद्दा के गुस्से से आम लोगों की तरह तुम्हें भी डर लगता है? हाँ, अम्मा तुम भी दिद्दा से न जाने कब डरने लगी थी। शायद इसलिए कि वह पहली संतान थी। शायद उसे वर्चस्व बनाना आता था। शायद वह तुम्हारी तरह मुलायम स्वभाव की नहीं बाबूजी की तरह अनुशासन वाले स्वभाव की थी। शायद वह पढ़ी-लिखी, दुनियादारी समझने वाली, मशवरा देने वाली बनती जा रही थी और तुम खुद को निरक्षर और कम जानकार मानती थी। शायद वह कुछ विषयों में बाबूजी के साथ जिस तरह बौद्धिक वार्ता करने लगी थी तुम्हारे लिये वे आसमानी बातें थीं। पर निर्णय लेने की तुम्हारी क्षमता अद्भुत थी अम्मा। मैं स्नातक कर रही थी। आमतौर पर तीन साल में होने वाले तबादले, प्रोन्नति के चलते हर साल हुए। हमलोग की पढ़ाई पर असर आ रहा था। मैंने प्रथम वर्ष भोपाल विश्वविद्यालय से किया। ये वे दिन थे जब डाकू आत्मसमर्पण कर रहे थे। उनके मुकदमे चलाने के लिये सागर में स्पेशल जेल कोर्ट बनाई गई। न्यायपालिका बाबूजी की ईमानदारी और योग्यता को स्वीकार करती थी। वे तबादले पर सागर की जेल कोर्ट भेज दिये गए। मैंने द्वितीय वर्ष सागर विश्वविद्यालय से किया। और ठीक अप्रैल में ए.डी.जे. से एम.ए.सी.टी. (मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल) के पद पर प्रोन्नत कर तबादला ग्वालियर कर दिया गया। अम्मा तुम चिंतित–

‘अब यह तीसरा साल ग्वालियर से करेंगी? इसीलिए तो प्रैक्टिकल में अच्छे नंबर नहीं मिलते। जब तक इसे प्रोफेसर पहचानते हैं, तबादला हो जाता है। फिर भी पर्चे (थ्योरी) के बल पर पचपन-अट्ठावन प्रतिशत ले आती है। बता ही रहे हो, साल या छह माह में डी.जे. बना दिये जाओगे। फिर तबादला होगा। तुम अपना प्रमोशन सम्भालो, हम बच्चों को लेकर रीवा में रहेंगे। जब तबादला थमेगा, तब वापस आ जाएँगे।’

मैंने अंतिम वर्ष रीवा विश्वविद्यालय से किया। साल पूरा होते न होते प्रोन्नत होकर बाबूजी जिला एवं सत्र न्यायाधीश बन कर इंदौर में पदस्थ हुए।

रीवा में नौकर-चाकर न थे पर अम्मा तुम्हारा गऊ प्रेम न छूटा। गऊ सेवा और सब्जी उगाने का तुम्हें बड़ा चाव रहा। तुम्हारे निर्देशन में बँगले में कार्यरत माली ऐसी सब्जी उगाते थे जिसका स्वाद और ताजगी आज भी याद है। हल्दी की फसल तो सिविल लाइंस में चर्चा का विषय बन जाती थी। हल्दी की वह खुशबू और विशुद्ध गाढ़ा पीलापन आज भी जेहन से नहीं गया है। तुमने रीवा के विशाल कच्चे अनगढ़ आँगन में गाय की सार छवा ली थी और पोई की भाजी, लौकी, कुम्हड़े लगा लिये थे। यह उपक्रम तुमसे आज भी न छूटता यदि बिस्तर पर न पड़ी रहती। गाय की कितनी पीढ़ी इस घर में रही, आज जो रह रही है कौन सी पीढ़ी है इसका लेखा-जोखा अब तुम्हारे पास भी नहीं होगा। बाबूजी ने अधिक सरंजाम जोड़ने न दिया। तबादले पर आधे ट्रक में कुल जमा सामान अँट जाता, आधे में गऊ माता। तुम चिंतित। जब तक गऊ ठिकाने पर नहीं पहुँचती इसकी डाइट का क्या होगा? हमलोग हँसते ‘अम्मा, हमलोग की डाइट की भी चिंता कर लिया करो।’

सागर में जो गऊ थी बहुत गुस्सैल थी। तुम्हारा रुतबा मानती थी पर हमलोग को पास न फटकने देती। तुम चारा खिला रही थी और गुस्सैल गऊ ने तुम्हारी भौंह में सींग मार दी। तुमने उसका नामकरण फटाका कर दिया था। दफ्तर से लौटे बाबूजी ने तुम्हारी मरहम-पट्टी देख गऊ की निंदा की या तुम्हारी, पता नहीं।

‘दे दिया प्रसाद। गऊ सेवा और लौकी-कुम्हड़ा उगाना ही डुड़हा में सीखा है।’

बाबूजी वक्त-बेवक्त तुम्हें इसी तरह निरक्षर प्रमाणित करते रहते थे। तुम अपना समर्थन करती ‘हमको पशु-पक्षी अच्छे लगते हैं। बच्चों की तरह हमको जवाब नहीं देते।’

सात स्वभाव, सात तेवर वाले सात बच्चे। आज सोचती हूँ तो लगता है तुम चाहती थी बच्चे तुम्हारी बातें ध्यान और आदर के साथ सुने। उन बातों को जेहन में बैठा ले जो अमल करने पर जीवन के भटकावों को कम करेंगी या रोकेंगी। हमलोग जाने-अनजाने तुम्हें आहत करने जैसा व्यवहार कर जाते थे। हमारी व्यस्ततायें, प्राथमिकतायें तुमसे बहुत अलग होती जा रही थीं। आहत हो तुम अलग चली जातीं। स्वेटर बुनतीं, गाय को सहलातीं, बगीचे में देखती क्या सब्जी तैयार हो रही है। पता नहीं कब तुमने स्वीकार कर लिया था पढ़-लिख गए बच्चों से तुम पिछड़ती जा रही हो। फिर तो रोज आधुनिक होते हुए उत्तर आधुनिक होता गया जमाना। गैजेट्स में मशगूल हो चले तुम्हारे बच्चे, नाती-नातिन। निरंतर पिछड़ती चली गई तुम पता नहीं कैसे उतनी पुरानी लगने लगी, जितनी हो नहीं। और अब…। हरपीज और पसलियों की पीड़ा के कारण निरीह से अधिक अधिकारविहीन लगने लगी हो। दिल भर आता है अम्मा। बहुत इच्छा होती है तुम्हारे लर्निंग एक्सपीरियेंस को ध्यान से सुन कर कुछ सीखूँ। नये माहौल की जानकारी धैर्य पूर्वक तुम्हें दूँ। पर छूट गए मौके और समय अब क्या लौटेंगे। सांत्वना देने के अलावा मेरे पास कुछ नहीं है। और तुम जीवन भर के अनुभवों से जानती हो सांत्वना में दम नहीं होता। आश्वासन फरेबी होते हैं। इसीलिए जब कहती हूँ–‘अम्मा तुम ठीक हो जाओगी।’

तुम्हारा एक ही उत्तर ‘पूर्व जन्म में पाप किये है। भोग रहे हैं।’

अम्मा मैं पूर्वजन्म और पुनर्जन्म पर विश्वास नहीं करती। मेरी याद में इस जन्म में तुमने कोई पाप नहीं किया है। यदि मान लूँ पूर्व जन्म में तुमने पाप किये हैं तो इतनी सजा भोग चुकी हो कि भगवान ने तुम्हें क्षमा कर दिया होगा। दोनों पैंरों में एक-एक पाव वजन के चाँदी के चूड़ा धारण करने वाली दीदी, बाबूजी पर अपनी पकड़ बनाये रखना चाहती थीं। शुरुआती दिनों में तुम रीवा में रखी गई कि बुजुर्गों की सेवा करो। छुट्टी पर बाबूजी पोस्टिंग से आते। दीदी तुम्हें कामचोर साबित करने में कसर न रखती। जबकि तंबाकू चुभलाती, ओसारी में दिन भर थूकती दीदी की पीक तक तुमने साफ की है। दीदी के सिखाये-पढ़ाये बाबूजी तुम्हारे कमरे में न जाते। दीदी का गौरव ‘हमार दादू दुलहिन का पसंद नहीं करय।’

अंधे बाबा की दाल में घी कम हो तो वे कटोरा फेंकते थे। भाँग प्रेमी कक्का के द्वारा कारण-अकारण पिटती निःसंतान काकी को बचाते हुए तुम भी जद में आ जाती। बाबूजी ने इतना रहम जरूर किया कि दीदी की आपत्ति के बावजूद तुम्हें अपने साथ पोस्टिंग पर रखने लगे। इतना सब सहन करते हुए पापों की सजा तुम भोग चुकी हो अम्मा!

‘अम्मा, पूर्व जन्म में तुमने पाप किये होते तो भगवान तुम्हें खूबसूरत नही कुबड़ी बनाते।’ बातों में थोड़ा मोड़ डाल मैं थोड़ी देर के लिये ही सही व्याधि से तुम्हारा चित्त हटाना चाहती हूँ। दर्द के बावजूद तुम सचमुच खिलखिला देती हो–‘कुछ दिन और जीवित रहे तो कुबड़ी हो जाएँगे।’

‘पाप किये होते तो आज इतनी अधिक पेंशन न कबाड़ रही होती।’

‘पिनसिन बाबूजी के पुण्य प्रताप से मिल रही है। पिनसिन के भरोसे ही तो हम इतना बड़ा हार्ट का ऑपरेशन कराने की हिम्मत किये। ईलाज के लाखों बूँक (फूँक) दिये लेकिन रोग बढ़ते जाते हैं। यह पाप नहीं तो क्या है?’

‘पाप कम करने के लिये माला जपो। दिनभर सीरियल देखती हो।’

‘माला जपने से टाइम पास नहीं होता…!’

‘देख-सुन कर तुम कुछ अँग्रेजी शब्द सीख गई हो। हमारी बात को तुम लोग सीरियसली क्यों नहीं लेते या पहले डिसाइड तो करो, करना क्या है?’ या ‘हमारा एस्टीमेट इतना ही है, अधिक खर्च नहीं कर सकते।’ या ‘ये हार्ट क्या होता है? इसमें वाल्व होते हैं? ये कहो मनुष्य का शरीर मशीन है।’

‘…सीरियल देख कर हो जाता है। तुमने बड़े मौके पर अपना पुराना टी.वी. हमको दे दिया। कमरे में बैठे-बैठे दुनिया जहान की न्यूज मिल जाती है। चल-फिर पाते नहीं हैं कि श्रीनाथ या गुड्डू के कमरे में जाकर टी.वी. देखें।’ पूरी एकाग्रता से सीरियल की ओर दृष्टि लगाये हुए तुम्हें देख कर अचरज होती है। तब बाबूजी की सख्ती बहुत थी। हमलोग शैक्षणिक संस्थान के अलावा कहीं जाने के लिये आजाद नहीं थे। एक माह में सिर्फ एक मूवी देख सकते थे। वह भी अम्मा तुम्हारे नेतृत्व में। तेज प्रकाश और ध्वनि के कारण तुम्हारा सिर भारी हो जाता। तीन घंटे तुम पर जबर गुजरते। अब अपनी रुचि से सीरियल देखती हो। सीरियल देखते हुए दवाई खाती रहती हो। तुम्हें अभ्यास हो गया है कौन सी गोली कब खानी है। सिराहने रखी मेज पर दवाइयों का डिब्बा, पानी, थ्रैप्टीन बिस्कुट, चना, मुरमुरा आदि रखवा कर घर के लोगों को निश्चिंत कर देती है कि जरूरत मुताबिक अपना काम स्वयं कर लोगी। गोली निगलते हुए कहती हो–‘अब यही जीवन है। खाओ और सोओ। जबकि न भूख लगती है, न नींद आती है।’

‘अब तक न जानती थी पर कल रात तुम्हारे कमरे में सोई तब जान पाई तुम्हें नींद क्यों नहीं आती।’ मैं जब भी रीवा आती हूँ, अम्मा के कमरे में रहती-सोती हूँ।

‘क्यों नहीं आती?’

‘तुम्हारे पढ़ाये मिट्ठू ने सुबह पाँच बजे मेरी नींद का कबाड़ा कर दिया। तुम्हारी भी करता होगा। तुम पिंजरा अपने कमरे में क्यों रखवा लेती हो?’

किसी चंडाल पक्षी के पंजे से छूट कर आँगन में आ गिरे शिशु सुआ के लिये अम्मा तुमने पिंजरा मँगाया, पढ़ाया। रात में पिंजरा अपने कमरे में रखवा लेती हो कि पक्षी को मौसम के अनुसार कमरे की ठंडक या गरमाहट मिल सके। भोर में मैं जब अच्छी नींद में थी उत्पाती मिट्ठू वेकअप कॉल दे रहा था ‘चित्रकूट के घाट में भय संतन की भीड़ …उठो अम्मा…।’

‘आँगन में बेचारा बिल्ली से डरता है।’

‘पर तुमने तो गजब कर दिया अम्मा। रात में पता नहीं कितनी देर कमरे में बछिया भी बँधवा ली।’

मिट्ठू का गायन थमा तो मैंने बछिया को रम्भाते पाया। पीठ पर दो परत चादर से लैस, बोरे पर बैठी आठ-दस दिन की बछिया।

‘रात में जाड़ा (ठंडा लग रही थी) रही थी। हमारे कमरे में आकर शांत हो गई। हरपीज और दर्द ने लाचार कर दिया वरना इतने छोटे पशु की सेवा हम खुद किया करते थे।’

‘तुमने जीवन भर सबकी सेवा की है।’

‘तब सोचते थे डुड़हा क्या छुटा हमारे ऊपर जिम्मेदारियाँ आती गई। लो, अब हम एक जिम्मेदारी बन गए। यही होता है। या तो सबकी जिम्मेदारी उठाओ या खुद सबकी जिम्मेदारी बन जाओ।’

अम्मा तुम बात-बात में ऐसी ही बड़ी बात कह देती हो। जिम्मेदारी बनना अर्थात अक्षमता! बच्चे अक्षम रहते हैं तब माता-पिता उनकी जिम्मेदारी उठाते हैं। जब माता-पिता अक्षम हो जाते हैं, बच्चों की जिम्मेदारी बन जाते हैं। फर्क यह, माता-पिता बच्चों की जिम्मेदारी को अपना ध्येय समझते हैं, बच्चे, माता-पिता की जिम्मेदारी को क्लेश। अम्मा तुम अपना और बच्चों का क्लेश समझ रही हो। खुद को समेटने लगी हो। श्रीनाथ और गुड्डू को समझाती हो–

‘बहनों को मौके-अवसर पर पूछ लिया करना। वे इस परिवार में जन्मी है। पूछ लोगे तो उनका मान-सम्मान बना रहेगा।’ हम बहनों से कहती हो ‘गुड्डू का ध्यान रखना। बुढ़ापे में अकेला न पड़ जाए। अपने बच्चों को कहा करो मामा-मामी का ध्यान रखेंगे। गुड्डू के एक ठो बच्चो हो जाता…यह शायद तुम्हारी अंतिम इच्छा है। तुमने अपने सात फिर हम भाई-बहनों के ग्यारह बच्चे पाले-पोसे हैं। जन्म से तीन माह तक बच्चे एक तरह से तुम्हारी सुपुर्दगी में रहते थे। रात भर जाग कर तुम  नाती-नातिनों को सँभालती थीं। मेरे दोनों बच्चे तीन माह के हो गए तब मैं उन्हें लेकर सतना आई। उनके लालन-पालन में कलेजा हाँफता था। लेकिन अब पता नहीं क्यों इच्छा होती है मैं तुम्हें वही भावना दूँ जो तुमने दी है। तुम्हारे न होने की कल्पना डराती है अम्मा। पर कुछ सच बहुत अधिक सच होते हैं। सोचती हूँ तुम जाकर गुड्डू की पुत्री के रूप में लौटो। अपनी अंतिम इच्छा के लिये। मुझे पुनर्जन्म पर विश्वास नहीं लेकिन जीन्स पर है। जीन्स की महिमा कुछ ऐसी हो कि बच्ची तुम्हारी शक्ल-सूरत लेकर आये। तुम्हें पालते-पोसते हुए हम भी तो जानें तुमने किस धीरज, ममता, परिश्रम से इतने बच्चों को पाला-पोसा है। वापस फिर आना अम्मा, गुड्डू की बेटी बनकर!


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