बतरस का बादशाह

बतरस का बादशाह

मेरा बचपन : मेरा जन्म बिहार के एक गाँव भदोखरा में अक्षय तृतीया के दिन हुआ था। जिस घर में मेरा जन्म हुआ था वह मिट्टी का बना था जिसे प्रत्येक शनिवार को गीली मिट्टी और गोबर से लिपा जाता था। गीली मिट्टी और गोबर से कीड़े-मकोड़े तो मरते ही थे घर की दीवारों में भी चमक आ जाती थी। 

भदोखरा में मेरा ननिहाल था। फिर भी पता नहीं क्यों किस शौक में आकर मेरे पिता जी ने वहाँ अपने लिए अलग से एक घर बनवाया था, वह कोई छोटा-मोटा घर नहीं, एक बड़ा सा मकान था, जिसमें चार कमरे, बीच में आँगन और दो दरवाजे थे जो उत्तर और पूरब की ओर खुलते थे। हाँ, एक लंबा-चौड़ा खंड भी था। उसमें एक कुआँ था जिसका पानी खारा था। खंड में नींबू, पपीता और अमरूद के पेड़ लगे थे। मकई के पौधे भी, जिसके पकने पर हमें खाने के लिए भुट्टा मिल जाता था। 

नानी के गाँव में मेरे बचपन के दस वर्ष बीते। जब मैं तीन-चार वर्ष का था तब एक लड़की के साथ खेला करता था। उसका नाम सरसतिया था। वह बहुत गोरी थी और फ्रॉक पहनती थी। वह मेरी बचपन की गर्ल फ्रेंड थी। उसके साथ जब मेरा खेलना-कूदना ज्यादा बढ़ गया तब मुझे पढ़ने के लिए स्कूल में भर्ती करा दिया गया। मेरे स्कूल का नाम राजेन्द्र मिडिल इंग्लिश स्कूल था। उसमें मैं चार साल तक पढ़ा–चौथी से सातवीं तक। और वर्ष के अंत में बोर्ड की फाइनल परीक्षा 1948 में पास हो गया। 

हमारे स्कूल के हेडमास्टर डॉ. श्रीनारायण लाल थे। पता नहीं कैसे देश-दुनिया की खबरें उनके पास उड़ती हुई चली आती थीं। उन्होंने ही पहली बार हम सब विद्यार्थियों को बताया कि हमारा देश आजाद हो गया। अँग्रेज भारत छोड़कर चले गए। लेकिन मेरी नानी का कहना कुछ और ही था। वह कहती थीं, अँग्रेज अपनी मर्जी से नहीं गए उनको गाँधी बाबा ने अपनी लाठी से खदेड़ कर भगा दिया। यह कहकर नानी नाचने लगीं। नाचते-नाचते जब वह थक गईं तब अपने रसोई घर में घुस गईं और अपने हाथों से लड्डू बनायीं जिसे हम बच्चों के बीच बाँट दिया। उस दिन हम बच्चों ने भी अपना-अपना कागज का तिरंगा झंडा बनाया और उसे अपने हाथों में लेकर महात्मा गाँधी और जवाहर लाल की जय-जयकार करते गली मोहल्लों में दौड़ते रहे। 

नानी के गाँव में मेरी कई मामियाँ थीं जो मुझसे मजाक करती थीं, जैसे भाभियाँ अपने देवरों के साथ करती हैं। पता नहीं वहाँ ऐसा रिवाज क्यों था! लेकिन था। शायद अब भी हो। 

मेरी नानी कोई रानी-महारानी नहीं थीं, फिर भी वह एक मालकिन थी। उनके पास एक महुए का पेड़ और एक इमली का पेड़ था जो अपने मौसम के अनुसार फूलते और फलते थे। जाड़ों में महुए के पेड़ से पीले-पीले फूल टपकते थे और इमली के पेड़ से खट्टी-मीठी इमली झड़ती थी। महुआ के फूल सूख जाने पर मीठे हो जाते थे, सो नानी उसके लड्डू बनाती थीं, जिसे हम चाव से खाते थे और गर्मियों में इमली की खट्टी-मीठी शर्बत भी पीते थे। 

बड़ों के मुँह से कभी सुना था, जब मैं बच्चा था और एक कमरे में सो रहा था तब छप्पर से लटकता एक साँप मेरे बिस्तर पर आ गिरा था। अँधेरा अच्छा था, मुझे कुछ नहीं हुआ। साँप मेरे बिस्तर से सरक कर नीचे कहीं छिप गया। मुझे साँप से बहुत डर लगता था लेकिन मेरी नानी को नहीं लगता था। वह घर में कहीं भी छुपे हुए साँप को सूँघ लेती थीं और उसे अपनी हिम्मत और हिकमत से पकड़ कर मार डालतीं। फिर मुझे कहतीं, साँप मर गया। अब डरो नहीं। लो इसे सामने वाले खेत में ले जाकर फेंक दो। लेकिन मैं उसे फेंकता नहीं था। कुछ देर तक अपने हाथ में लेकर उसे हवा में घूमाकर खेलता था। फिर बाद में फेंक देता था।  

बचपन में मैं बहुत खिलंदड़ था। भैंस की पीठ पर बैठकर उसके साथ पोखर के पानी में उतर जाता था। भैंस पानी में उतरी नहीं कि उसकी देह में ढेर सारे जोंक लटक जाते थे और उसका खून चूसते थे। तब मैं भींगे बदन दौड़कर अपने घर चला जाता और पोटली में बाँधकर नमक ले जाता जिसे इन जोंकों पर छिड़क देता। तुरंत जोंक बिलबिलाकर मरने लगते और उनके खून से पोखर का पानी लाल हो जाता। 

हाँ, यह बताना तो मैं भूल ही गया कि उन दिनों गुलेल से चिड़ियों को मारना, नहर पोखर में मछली पकड़ना, चूहे मारकर खाना और केकड़ों को आग में पकाकर खाना मेरी रोज-रोज की आदत बन गई थी। 

हमारे नानी के गाँव में एक शिवालय था जिसके बगल में एक तालाब था। उसमें हम कूद कूदकर नहाते थे। पानी में गोते लगाकर नीचे की सतह को छू लेते थे। तब कभी-कभी कंकड़, पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़े मेरी मुट्ठी में आ जाते। उसे हम उठा लेते। संयोग से एक बार मेरी मुट्ठी में एक काले पत्थर का टुकड़ा आ गया जो देखने में शिवलिंग के जैसा लगता था। उसको लेकर हम शिवालय के पंडित जी के पास गए और उनसे कहा–देखिए तो पंडित जी, यह क्या है? उन्होंने उसको उलट-पलट कर देखा, लेकिन मुँह से कुछ बोले नहीं; चुपचाप उसे ले जाकर एक पीपल के पेड़ के नीचे रख दिया। जब गाँव के लोगों की नजर उस पर पड़ी तो सहसा उनके मुँह से निकल पड़ा कि यह तो शिवलिंग है।

जब इसकी खबर गाँव की महिलाओं को लगी तो वे सब झुंड बनाकर उसे देखने आईं। देखने के बाद उन सबने मिलकर एक स्वर में कहा कि यह तो महादेव हैं। दूसरे दिन सुबह से वे सब महिलाएँ आकर उस पर बेलपत्र चढ़ाने लगीं, दूध ढारने लगीं और देखते-देखते वहाँ एक अदृश्य शिवमंदिर खड़ा हो गया। 

वहाँ बचपन में मेरे बहुत से दोस्त यार थे। रामौतार, श्री किसनु, केदार, दिनेश, उपेन्दर, सिद्धे, तिलकधारी, गोविन्दा वगैरह बहुत से थे पता नहीं, वे सब कहाँ हैं, कैसे हैं? हमारी नानी के गाँव में पर्व त्योहार भी खूब मनाए जाते थे। खासकर होली दीवाली के मौकों पर। होली के दिन हमारे नाना, मामा लोग, खूब रंग खेलते थे, एक दूसरे को अबीर लगाते थे। और ‘कहाँ गई भौजी, कहाँ उसका लहँगा सब मिल देवर ले भागा’ गाना भी खूब गाते थे–‘भर फागुन बुढ़वा देवर लागे, हाँ देवर लागे, जो देवर लागे’। तब उनके बीच में ढोलक बजाता था। ‘ता धिन्ना ता दिन धिन्ना, धिन्ना ता दिन धिन्ना, धिन्ना ता दिन धीन्ना, ठप ठपा ठप, ठप ठपा ठप’ की ढोलक पर थाप लगाता था। 

उसके बाद गुड़ सौफ की शरबत पीता, भंग की गोली खाता था। भंग से तेज भूख लग जाती। तब घर आकर भरपेट मालपूआ खाता और सो जाता। सोने पर लगता मेरी खटिया आसमान में उड़ी जा रही है और मैं जमीन पर अब गिरा कि तब गिरा। लेकिन मैं कहीं नहीं गिरता था। लेटे-लेटे आराम से अपनी खटिया पर सो जाता था। 

उन्हीं दिनों नानी के गाँव में एक पुस्तकालय खुला था जिसका नाम राजेन्द्र हिंदी पुस्तकालय था। याद आता है, किसी अखबार में नाम पता देखकर मैंने एक पोस्टकार्ड दिल्ली के पते पर भेजा था और वहाँ से हिंदी वाला ‘अमेरिकन रिपोर्टर’ पुस्तकालय में आने लगा था। 

उन दिनों अमेरिका भारत की जनता से सीधा संपर्क और संवाद स्थापित करने और अपनी वैदेशिक नीतियों के प्रचार-प्रसार के लिए यह सब कर रहा था। बरसों बरस वह अखबार गाँव के पुस्तकालय में आता रहा। 

फिर मैं 7 जनवरी 1949 के दिन कलकत्ता चला आया और मेरा नानी का गाँव पीछे छूट गया। 

वरिष्ठ लेखक हर्षनाथ 

हर्षनाथ कलकत्ते के साहित्य समाज में इस मायने में अद्वितीय लेखक थे कि उनकी पहली कहानी ‘कलकत्ते का मोची’ मुंशी प्रेमचंद के ‘हंस’ में छपी थी। इसके बाद तो उनके कथा लेखन का लंबा सिलसिला शुरू हुआ। कभी कहानी तो कभी उपन्यास वे नियमित लिखने लगे। 

उन्होंने अपने रचनाकाल में ढेर सारी कहानियाँ और दर्जन भर उपन्यास लिखे। इतना ही नहीं, जब सत्तर के दशक में युवा लेखकों ने लघु पत्रिका आंदोलन का सूत्रपात किया और उनमें से हरेक ने अपनी-अपनी पत्रिका निकाली तब हर्षनाथ जी ने भी अपने संपादन में ‘आयुध’ नाम की पत्रिका निकाली। भला वे किस युवा लेखक से कम थे। 

रचनात्मक साहित्य के धरातल पर उनके कहानी-संग्रहों में ‘कमीने और शरीफ’ एवं ‘कोई आदमी लाओ’ तथा उपन्यासों में ‘उड़ती धूल’ और ‘करमू और गजनी’ तथा ‘जंजीरें टूटती हैं’ बहुचर्चित-प्रशंसित रचनाएँ हैं। उनकी कुछ कहानियों का अनुवाद विदेशी भाषाओं में भी हुआ। 

हर्षनाथ जी ने जीविकोपार्जन के लिए कई धंधे और नौकरियाँ कीं। सबसे पहले हिंदी संकेत लिपि विद्यालय खोला फिर एक व्यावसायिक संस्थान में मैनेजर बने। उसके बाद एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में जनसंपर्क अधिकारी नियुक्त हुए। आखिर में उन्होंने लड़कियों के एक कॉलेज में अधीक्षक के पद को भी सुशोभित किया। 

हर्षनाथ जी को मैं ‘दादा’ कहता था और वे मुझसे बहुत स्नेह करते थे। लगभग रोज शाम को मुझसे मिलने मेरे दफ्तर में आ जाते। मैं भी जल्दी से अपना काम निपटाकर उनके साथ ऑफिस से निकल जाता और दोनों एक साथ पैदल चलकर कॉफी हाउस आ जाते। वहाँ जो टेबल खाली दिखायी पड़ती वहाँ जाकर बैठ जाते। उन्हीं दिनों मैंने गौर किया कि हर्षनाथ जी को कॉफी हाउस के सभी बेयरे पहचानते थे। उनलोगों का इनके साथ दुआ-सलाम भी होता था। लेकिन उन बेयरों में से किसी ने भी मेरे साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया। मुझको कभी सलाम नहीं किया। इसके बारे में मैं मन-ही-मन सोचता, लेकिन कुछ समझ में नहीं आता। इस बीच हमारे टेबल पर कॉफी आ जाती और दादा मुझे टोकते–क्या सोच रहे हो, कॉफी पीओ, ठंढी हो जायगी। जल्दी से पीओ और थोड़ी देर के लिए मुझे अकेला छोड़ दो। मैं वैसा ही करता। तुरंत नीचे पान खाने चला जाता फिर जल्दी लौटकर उनके साथ बैठ जाता। बैठते ही दादा कहते–लो कहानी बन गई। ‘केशवदास की आत्मा’। फिर पूछते–शीर्षक तुम्हें कैसा लगा। मैं असमंजस में पड़ जाता फिर भी उन्हें साफ कह देता–मैंने कहानी तो सुनी नहीं, शीर्षक के बारे में क्या बताऊँ! ठीक है, छपकर आएगी तो पढ़ लेना। अब यहाँ से उठो। हमलोग रॉयल इंडिया होटल चलते हैं। वहाँ कुछ ‘नॉन बेज’ खाया जाय। हमलोग उस होटल में आ जाते। वहाँ दादा चीकेन बिरयानी खाते, मुझे भी खिलाते। उनको मुस्लिम होटल का खाना बहुत पसंद था। वैसे, अपने घर में वे निरामिष ही रहते और अपने हाथ से खाना बनाते खाते थे। उनके घर मेरा आना-जाना था। वे बड़ा बाजार के शिवठाकुल गली में रहते थे। तब उस गली में हर्षनाथ जी के अलावा तीन-चार कवि लेखक और रहते थे, जैसे-आलोचक श्रीनिवास शर्मा, कवि द्वय–श्री हर्ष और शंकर माहेश्वरी, ग़ज़लकार मुरारी लाल शर्मा और ‘मननाहीं दस बीस’ का लेखक, सुरेश शर्मा। अब तो वह गली भी इन लेखकों से खाली हो गई। वे सब यहाँ से निकल कर दूसरी जगहों में चले गए। बाकी बचे दो–दादा हर्षनाथ और कवि शंकर माहेश्वरी। वे भी कब के दिवंगत हो गए।

कवि जो नेपथ्य नायक था

नवल से मेरी पहली मुलाकात 1958 के सितंबर में हुई। पंजाब नेशनल बैंक के चौरंगी स्क्वायर ब्रांच में। हमारी यह मुलाकात आगे चलकर दोस्ती में बदल गई जो आजीवन बनी रही। 

हाँ, यह बताना तो मैं भूल ही गया कि पहली मुलाकात में मैं जिस व्यक्ति से मिला था वह कोई ‘नवल’ नहीं था बल्कि जयप्रकाश खत्री था। उसका जन्म अमृतसर में 11 मई 1940 में हुआ था। बाद के दिनों में वह अमृतसर से दिल्ली-कानपुर होता हुआ कलकत्ते पहुँचा था, 1957 में। और यहाँ बैंक में नौकरी करने लगा था। तब वह मेरा सहकर्मी था। नौकरी की शुरुआत में हम दोनों ने 6 महीनों तक 40 रुपये के मंथली स्टायपेंड पर क्लर्क की ट्रेनिंग ली थी। बाद में हम दोनों को 112 रुपये का मासिक वेतन मिलने लगा था। 

कुछ ही दिनों में मेरा ट्रांसफर चौरंगी ब्रांच से डलहौज़ी के ऑफिस में हो गया और नवल का साथ छूट गया। फिर सिर्फ टेलीफोन से उसके साथ ‘हाय हलो’ होता रहा। 

नवल जन्म से पंजाबी था और उसके व्यक्तित्व में पंजाबियत का रंग भरा था। वह एक जिंदादिल इनसान था। आपसी नोंक-झोंक में वह मुझे चुगद और मैं उसको अहमक कहता था। लेकिन वह अहमक नहीं बुद्धिमान था। चतुर, चालाक और हँसमुख था। खूब हँसता, हँसाता और अपनी मखौल भी उड़ाता था। लेकिन अगर दूसरा कोई उसका मखौल उड़ा देता तो जबाव में वह उसको धूल चटा देता था। मैंने यह भी देखा था कि बड़े-बड़े कवि, लेखकों को धमका देना उसकी फितरत में शामिल था। दोस्तों के बीच बातचीत में वह बहुत मुखर और बतरस का बादशाह था।

जब पहली बार उसने कलकत्ते की साहित्यिक दुनिया में अपना कदम रखा तब देखते देखते वह एक साथ कई भूमिकाओं में सक्रिय हो गया और कई महत्त्वपूर्ण कार्य कर डाले। वह बहुमुखी प्रतिभा का घनी लेखक था। उसने एक साथ कई विधाओं में लिखा जिनमें कविता, कहानी, संस्मरण आदि शामिल थे। उसकी कई पुस्तकें प्रकाशित हैं जिनमें ‘आधी रात का शहर’, ‘कालाहाँडी’, ‘साँप सीढ़ी’, ‘तुमसे अलग नहीं’ और ‘अपात्र’ उल्लेखनीय हैं। 

कलकत्ते में जब कभी कहीं काव्य पाठ का कार्यक्रम होता वह मुझे अपने साथ जरूर ले जाता। बस, ट्राम, टैक्सी भाड़ा खुद ही देता। चाय-पानी का पैसा भी मुझे नहीं देने देता और इस तरह तत्काल मेरा अघोषित गार्जियन बन जाता। हम दोनों का एक दूसरे का घर आना-जाना था। जब कभी लेक गार्डेंस उसके घर गया खाना खाकर ही लौटा। वह खुद भी भोजन रसिक था। 

उसे पैसों की लालच नहीं थी। कवि था–नाम-वाम का रहा हो तो रहा हो। वैसे कवि के रूप में उसका बहुत नाम हुआ। वह कलकत्ते का सर्वाधिक लोकप्रिय कवि था। कलकत्ता ही क्यों पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़ तक उसका नाम फैला था। 

पता नहीं क्यों बाद के दिनों में उसने आकाशवाणी और दूरदर्शन के कार्यक्रमों में जाना छोड़ दिया था। हाँ, एक बात और आपलोगों को बताना चाहता हूँ। मेरे साथ आपसी बातचीत में नवल अपने किन्हीं ‘गुरु’ का हवाला बार-बार देता था। उन्हीं गुरु जी ने उसको दीक्षा दी थी कि तुम कभी सामने मंच पर नहीं आना। नेपथ्य में रहना और जो करने का मन करे, करते रहना, जिसका नवल ने अपने साहित्यिक जीवन में पूरा-पूरा निर्वाह किया। खुद कभी मंच पर नहीं आया। उसने सैकड़ों काव्य-गोष्ठियों का आयोजन किया। हॉल के अंदर मंच पर कविगण अपना-अपना काव्य पाठ करते रहे और वह बाहर गेट पर चुपचाप बैठा रहा। 

हाँ, नवल का मेरी पत्नी उषा के साथ रोज सुबह-सबेरे ‘सुप्रभातम’ होता था। यह मुझे दो महानगरों-कोलकात्ता और मुंबई के बीच संस्कृति के आदान-प्रदान जैसा लगता था। 

नवल ने चौपटानन्द, खड़ेश्वर बाबा, श्रीधर बाबू, बाँके बिहारी जैसे कितने ही छद्म नामों से भी लिखा। जब उसने ‘अप्रस्तुत’ का प्रकाशन आरंभ किया तो उसकी शृंखला में अनेकानेक रचनाकारों को छापा। एक दशक में लगभग 300 सौ नयी पुस्तकें और उनके लेखक सामने आए। अप्रस्तुत के अलावा अपूर्वा, स्वर-सामरथ, साहित्य बुलेटिन, काव्यम् आदि पत्रिकाओं के पीछे उसी का हाथ था। 

‘आधी रात का शहर’ और ‘कालाहाँडी’ उसके उल्लेखनीय कविता-संग्रह हैं। बाद में ‘अपात्र’ नाम से उसका एक कहानी-संग्रह भी आया। कुल मिलाकर उसका साहित्यिक अवदान बहुत बड़ा था। 

फिर एक दिन ऐसा भी आया कि नवल अपने पीछे अपना रचना संसार छोड़कर अचानक 24 अप्रैल 2020 को इस दुनिया से चले गए। 

कथाकार रामनारायण शुक्ल

रामनारायण शुक्ल एक ऐसे लेखक थे जिन्हें जीने के लिए बहुत छोटी उम्र मिली। वे कुल तीस साल जीवित रहे। इतने छोटे से जीवन में उन्होंने अनेकानेक उत्कृष्ट कहानी भी लिखकर हिंदी कथा साहित्य में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। 

उनकी कहानियाँ गहरी मानवीय संवेदना में रची बसी कहानियाँ हैं, जिनके कथापात्र बेकारी की समस्या को झेलते हुए आजीविका के लिए संघर्षरत हैं। माना जाता है कि रामनारायण की कहानियाँ उनके व्यक्तित्व से बड़ी थीं। बकौल राजेन्द्र यादव उनकी कहानियों को वो रिकागनिशन नहीं मिला जो निश्चय ही उनका प्राप्य था। मुक्तिबोध की रचनाएँ उनके व्यक्तित्व से बड़ी थीं। इस कारण उनकी मृत्यु के बाद उनकी रचनाएँ ज्यादा चर्चित हुईं। शायद रामनारायण शुक्ल की कहानियों में कलकत्ता शहर भी एक जीवित पात्र है…उनकी कहानियों में बेकार होने की मजबूरी और बेकार होने के भय का जैसा जीवंत और मार्मिक चित्रण मिलता है, हिंदी साहित्य में शायद ही कहीं और मिले। 

रामनारायण शुक्ल के प्रकाशित कहानी संग्रहों के नाम इस प्रकार हैं–‘सहारा’, ‘किसी शनिवार को’, ‘डाब’, ‘महेन्द्र का भाई’ और ‘पूरा सन्नाटा’।

वैसे रामनारायण में कुछ व्यक्तिगत कमजोरियाँ भी थीं जो उनकी तुलना में शुरु में ज्यादा थीं। हम दोनों कभी कभार ड्रिंक करते थे और ‘चारमीनार’ सिगरेट भी पीते थे। 

रामनारायण को फिल्में देखने और फिल्मी गाने सुनने का शौक भी था। अपने इस शौक को पूरा करने के लिए वे चौरंगी के कल्पतरु रेस्टोरेंट में जाया करते थे, जहाँ उसके हॉल में एक बड़ा सा म्यूजिक बॉक्स रखा रहता था जिसमें चवन्नी का सिक्का डालकर कोई भी अपना मनपसंद गाना सुन सकता था। रामनारायण चवन्नी खर्च करके अपना यह शौक पूरा करते थे, हालाँकि उन दिनों उनको पैसों की कड़की रहती थी। यही वह समय था जब वे एंग्लो इंडियन लड़के-लड़कियों को ट्यूशन पढ़ाकर अपना खर्च निकालते थे। तब मैं एक ऑफिस में छोटी-मोटी नौकरी करता था। यह बात 61-62 की होगी। 

हाँ, यह भी याद आता है कि उन दिनों राजकमल चौधरी के साथ अंतरंग मित्रता थी। इस तरह मैं इन दोनों का उभय मित्र था। सो अचानक एक दिन मेरे मन में ख्याल आया कि इन दोनों को किसी दिन आपस में मिलवाया जाय। बैठकर एक साथ चाय पीया जाय। लेकिन तुरंत मेरे मन में खटका हुआ। ये दोनों तो विपरीत ध्रुवों के सितारे हैं। साहित्य में वैचारिक धरातल पर एक दूसरे के विरोधी हैं। जहाँ राजकमल अपने लेखन में ‘प्रेमपुजारी’ हैं और उनकी कहानियों में नारी के लिए विशेष जगह है वहीं रामनारायण की रचनाओं में किसी भी नारी पात्र का अता-पता नहीं है। वह तो इनके यहाँ सिरे से गायब है। कारण जो भी हो, उस समय उन दोनों के बीच संवादहीनता की स्थिति थी और अपरिचय का फरेब भी था। खैर, उन दोनों के बीच जो था सो था लेकिन मैंने अपना जो प्रोग्राम बनाया था उसमें दोनों आए और हमलोग चाय के लिए धर्मतल्ला के अजंता रेस्टोरेंट में एक साथ बैठे और चाय पीने लगे। तभी मैंने गौर किया कि वे दोनों आपस में बात नहीं कर रहे बल्कि एक दूसरे की उपस्थिति को भी नजरअंदाज कर रहे हैं। मुझे महसूस हुआ, उन दोनों को आपस में मिलवाने की कोशिश में मैं सफल नहीं हो सका जिसका मलाल मुझे आज भी है।


Image : Two Children on a Road
Image Source : WikiArt
Artist : Chaim Soutine
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कपिल आर्य द्वारा भी