पेड़ से शाख का यूँ टूटकर गिरना

पेड़ से शाख का यूँ टूटकर गिरना

स्मृति : ज्योत्स्ना मिलन

 

सोचती हूँ तो यकीन नहीं होता, लगता है कोई बुरा सपना देखा है। ज्योत्स्ना जी और मृत्यु। लेकिन सत्य को कब तक नकारा जा सकता है…हृदय में हूक-सी उठती है…और याद आता है कि वे हमारे बीच से चली गईं। अंतिम दिन उनको मशीनों के बीच देखा था…झटका देता पाइप…छोटी-सी काया…शांत मुख-मुद्रा…। रात में खबर आई वे नहीं रहीं। देह ने प्राणों को छोड़ दिया या प्राणों ने देह को…। सारी रात सन्नाटे में डूबी लगी, मन छटपटाता रहा…मृत्यु का ऐसा असर मेरी चेतना पर था कि रातभर मुझे एक-एक चेहरा रुलाता रहा…कमला जी का, भगवत अंकल का…जब्बार ढाकवाला और तनु जी और मेरे पिता का चेहरा और मेरे ताऊ जी का चेहरा…क्या मृत्यु मेरे आसपास यूँ डेरा डालकर बैठी है…। सोचकर रूह काँप उठती, कल जीवन का…और क्षणों बाद ही राख…इनसान…पानी की एक बूँद तक नहीं ले जाता…और अकस्मात् सब कुछ बदल जाता है…अन्यथा क्यों हम सब नियति मानकर नहीं चलते हैं…मन नहीं मानता।

याद करती हूँ…25 अप्रैल को वो शाम…जब आंलियांस में ज्योत्स्ना जी और मैं साथ में थे। अखिलेश जी ने पूछा था कि उद्घाटन किससे करवाएँ, तब मेरी जबान पर एक ही नाम आया था ज्योत्स्ना जी का…। जहाँ मैं कहानी-पाठ कर रही होऊँ, वहाँ ज्योत्स्ना जी की उपस्थिति कितनी महत्त्वपूर्ण होगी मेरे लिए। वे हमेशा की तरह नियत समय पर पहुँचीं। साथ में शम्पा थी। हम दोनों ने देर तक अनूप श्रीवास्तव के चित्रों को देखा…। वे मुख्य अतिथि थी तो उन्होंने संक्षिप्त-सी प्रतिक्रिया व्यक्त की। कहानी-पाठ के तुरंत बाद मुझे दिल्ली जाना था, उन्होंने मुझे वहीं से विदाई दी…मुस्कुराते हुए, गले मिलकर, एक पवित्र विदाई। सीढ़ियाँ उतरते हुए मैंने शम्पा से कहा कि एक जरूरी कार्यक्रम के बारे में तुम्हारे साथ बैठकर बात करनी है। दरअसल वह मेरी गोपनीय योजना थी कि ज्योत्स्ना जी का ‘अमृत महोत्सव’ मनाया जाएगा। पुरुष साहित्यकारों का अमृत महोत्सव तो मनता रहता है, पर एक महिला साहित्यकार का अमृत महोत्सव भी उसी तरह मनाया जाना चाहिए। जब मैं लौटकर आई तो…रमेश दवे जी ने बताया कि ज्योत्स्ना जी हॉस्पीटल में एडमिट हैं…मेरे दिमाग में दूर-दूर तक नहीं था कि…वे बीमार हो सकती हैं…या ऐसा कुछ हो सकता है। जाने के लिए तैयार हुई तो पता चला उनका ऑपरेशन (बाईपास) चल रहा है…और दूसरे दिन जब पहुँचे तो वे अचेत थीं…सब कुछ…इतने जल्दी में हो गया था कि कुछ सोचने का मौका ही नहीं मिला। उस दिन हम लोग देर तक शाह साहब के पास बैठे रहे। दवे साहब से बातें होती रहीं ज्योत्स्ना जी को लेकर। उनके पारिवारिक जीवन को लेकर। उनकी सक्रियता को लेकर। उनकी मेहनत और समर्पण को लेकर, उनकी साहित्यिक यात्रा को लेकर।

ज्योत्स्ना जी से इधर मेरी अच्छी मित्रता हो गई थी। हम दोनों लगातार कई कार्यक्रमों में साथ होते। एक दूसरे से मिलते, गले मिलते, बातें करते। वे भारत भवन में जमीन पर बैठतीं अलग, उनकी बैठने की मुद्रा अलग ही होती। सीधी तनकर बैठी वे एकाग्र होकर सभी वक्ताओं, कथाकारों और कवियों को समान भाव से सुनतीं। कार्यक्रम के बीच में कभी बात न करती। एक योगी की मुद्रा होती उनकी। कहूँ कि वे बहुत ही शानदार श्रोता थीं…जो रचना को पूरी तरह से आत्मसात करती थीं। ‘स्पंदन’ में हमने उनके उपन्यास ‘केसरमाँ’ पर संगोष्ठी रखी थी, तब उन्होंने उपन्यास के कुछ अंशों का पाठ किया था। प्रेमचंद जयंती पर उन्होंने अपनी बहुत ही अच्छी कहानी ‘बा’ का पाठ किया था। ज्योत्स्ना जी का लेखन…उनके उपन्यास, कहानियाँ…कविताएँ, लेख और संस्मरण…एक अलग ही भावभूमि पर लिखे गए हैं। वे बहुत मेहनत करके अपनी रचनाओं को अंतिम रूप देती थीं। शब्दों के प्रति बेहद सजग रहती थीं। भाषा की कलात्मकता उनकी रचनाओं को खास और अलग बनाती है। मैंने उनसे लंबी बात की थी और मैं ‘केसरमाँ’ पर समीक्षा लिखकर उनको सुनाने वाली थी। तय हुआ था कि शाह साहब जब अल्मोड़ा से लौटकर आ जाएँगे तब एक दिन बैठकर मैं वहीं पर इस समीक्षा का पाठ करूँगी…यह वायदा भी अधूरा रह जाएगा मैंने कब सोचा था…?

ज्योत्स्ना जी अपनी बनावट में जितनी कोमल दिखती थीं, मानसिक और वैचारिक रूप से उतनी ही मजबूत थीं। अपनी बातों पर, अपने विचारों पर अडिग रहने वाली ज्योत्स्ना जी उतनी ही सहज भी थीं अपने व्यवहार में, बातों में, उनके घर जाने पर उनके द्वारा किए जाने वाले स्वागत-सत्कार में…सभी में सादगी और सहजता होती थी। साहित्यिक कार्यक्रमों के बीच हम एक दूसरे की पोशाकों की तारीफ किए बिना नहीं रहते। मैं उनके कुर्तों की हमेशा तारीफ करती और उनके चेहरे की…त्वचा की…कि वे क्या खाती हैं…क्या लगाती हैं कि उम्र उनके चेहरे पर दिखाई नहीं देती। वे मेरी साड़ियों की प्रशंसा करतीं…। उनको हर कपड़े के बारे में बारीक से बारीक जानकारी होती और वे विस्तार से बतातीं। शाह साहब से हुआ परिचय ज्योत्स्ना जी से दोस्ती में यूँ बदल जाएगा…यह मैंने तब महसूस किया जब मैं उनके निकट आती गई। हर स्त्री की तरह उनके जीवन की गाथा भी कम मार्मिक और झकझोरने वाली नहीं है। अपने जीवन के संघर्षों के बारे में वे यदा-कदा बताया करती थीं। संवेदनशील इतनी कि मेरे पिता के निधन की खबर सुनकर जब वे मिलने आईं तो बताने लगीं कि अपने पिता की मृत्यु के बाद महीनों तक उनके आँसू नहीं थमते थे। इधर अपने छोटे भाई की मृत्यु को लेकर वे गहरे सदमे में थीं…जिक्र आने पर उनकी आँखें भर आती थीं, गला रुँध जाता था। उनकी रचनाओं की सिलसिलेवार जमकर अनुवाद कार्य में लगी थीं।

ज्योत्स्ना जी का घर साहित्य और कला का पर्याय माना जाता है–शाह साहब (रमेशचंद्र शाह), स्वयं ज्योत्स्ना जी, शम्पा तथा राजुला शाह…यानी चारों सदस्य साहित्य और कलाओं के पारखी! ज्योत्स्ना के साहित्य और व्यक्तित्व पर जितनी चर्चा होनी चाहिए थी, नहीं हुई, जबकि उन जैसी विदुषी साहित्यकार हमारे हिंदी समाज में उँगलियों पर गिनी जा सकती हैं। एक विदुषी, भावप्रवण, संवेदनशील साहित्यकार को याद रखने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि उनकी रचनात्मकता पर विस्तार से बात हो…मैं उन्हें कभी भी नहीं भूल सकती। पता नहीं कौन-सा तार है, जो हम दोनों को जोड़कर, बाँधकर रखता है। वे मेरे भीतर हैं, हर पल मुझे यही महसूस होता है कि अभी यहीं कहीं से वे मंद-मंद मुस्कुराती हुई सामने खड़ी होगी। जीते जी मैं उनको कभी नहीं भूल पाऊँगी। उनकी आत्मीयता मेरी स्मृतियों में सदैव रहेगी।


Image : A Tree Branch
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Artist : Alexander Ivanov
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उर्मिला शिरीष द्वारा भी