तीन पीढ़ियों की–एक साहित्यिक कड़ी का अवसान

तीन पीढ़ियों की–एक साहित्यिक कड़ी का अवसान

अम्मा जी यानी शीला सिन्हा, प्रसिद्ध कहानीकार स्व. राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह की पुत्रवधू, साहित्यकार स्व. उदय राज सिंह की धर्मपत्नी और साहित्यिक पत्रिका ‘नई धारा’ के प्रधान संपादक प्रमथ राज सिंह की माँ। प्रमथ राज सिंह की माँ क्या हुई सभी के लिए हो गईं अम्मा जी।

अम्मा जी से मेरी पहली मुलाकात 2005 में हुई थी। दूरदर्शन महानिदेशालय द्वारा मुझे राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह जी की कहानी ‘कानों में कँगना’ में टेलीफिल्म बनाने की जिम्मेदारी दी गई थी। कहानी हालाँकि कॉपीराइट से बाहर हो चुकी थी, लेकिन सरकारी माध्यम होने के कारण तब के निदेशक ने विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी थी और राजा साहब के वंशजों से अनुमति लेना हमारी प्राथमिकता में था। जानकारी हासिल करने में कोई समस्या नहीं आयी, साहित्यकार शिवनारायण जी ने घर का रास्ता बता दिया। पता चला कि राजा साहब की पुत्रवधू शीला जी बोरिंग रोड में रहती हैं। संपर्क नंबर तो नहीं मिल पाया, लेकिन एक दिन मैं उनके निवास पर पहुँच गया। कारिंदों द्वारा मुझे बिठाया गया। कुछ देर बाद अम्मा जी हाजिर हुईं। मैंने अपना परिचय देते हुए आने का कारण बताया। कारण जानकर बहुत खुश हुई। मुझे इस कार्य की पहल के लिए आशीष भी दीं। टेलीफिल्म निर्माण के लिए उनसे अनुमति लेनी थी। मौखिक अनुमति तो मिल चुकी। अनुबंध पत्र पर हस्ताक्षर के साथ की सहमति चाहिए थी। दूसरे दिन आने की बात कर जैसे ही जाने को उठ खड़ा हुआ, अम्मा जी ने इशारे से बैठने को कहा।

‘बिना कुछ खाये-पिये जायेंगे तो राजा साहब की तौहीन होगी।’

अब तो मेरे पास कोई चारा ही नहीं था। कहानी पर उनसे बात होने लगी। विवरणात्मक कहानी होने के कारण दृश्य-श्रव्य माध्यम के लिए टेलीफिल्म के निर्माण में पटकथा लेखक की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। सोचा अगली मुलाकात में पटकथा लेखक को भी साथ लाना जरूरी है। तबतक कारिंदे चाय-नाश्ता लेकर आ गए थे। चाय-नाश्ते के बाद अगली मुलाकात का समय लेकर हम रवाना हुए। एक सप्ताह बाद पुनः पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार अम्मा जी से मिलने जाना हुआ। पटकथा लेखक भी साथ थे। अम्मा जी से ‘कानों में कँगना’ कहानी पर बात शुरू हुई। राजा साहब की यादों को भी टटोला गया। अम्मा जी ने बहुत खुलकर हमारी सभी जिज्ञासा का निदान किया।

कहानीकार का वारिस होने के कारण उन्हें एक अनुबंध पत्र पर हस्ताक्षर करना था। सरकारी नियमानुसार उन्हें निर्धारित राशि का भुगतान भी करना था। औपचारिकता पूरी करने में बहुत अधिक समय जाया नहीं हुआ। लेकिन मेरा काम ‘कानों में कँगना’ को समझना भी था, क्योंकि नब्बे साल पहले इस कहानी की रचना की गई थी। तब दृश्य माध्यम का नामोनिशान भी नहीं था। रचनाकार ने तब के पाठकवर्ग को ध्यान में रखते हुए ही इसकी रचना की थी। संस्कृत शब्दावली की भरमार है ही। कहानी में संवाद भी न के बराबर है। पटकथा लेखक को इसकी गुंजाइश संवाद लेखक के लिए बनानी थी। कहानी के तब के परिवेश को समझना जरूरी था। घंटे भर से अधिक हमारी बातचीत जारी रही। अम्मा जी ने राजा साहब की कहानी की परत-दर-परत खोलकर हमारे सामने रख दिया। जब हमदोनों पूरी तरह कहानी के मर्म से संतुष्ट हो गए, फिर उस दिन हमारी बैठकी समाप्त हुई। टेलीफिल्म निर्माण के बाद बात करने/मिलने का वादा कर हम वहाँ से रुखसत हुए।

फिल्म के निर्माण होने में छह महीने से अधिक का समय लग गया। खैर प्रसारण समय और तिथि निर्धारित हो चुकी थी। अम्मा जी को फोन लगाया। प्रसारण की जानकारी देने पर बहुत खुश हुई। प्रसारण के उपरांत पुनः उनकी प्रतिक्रिया जानने को फोन किया। उनकी ओर से अच्छी प्रतिक्रिया मिली। एक निर्माता/निर्देशक का यही पुरस्कार होता है। कहानीकार और उस कहानी के मर्म को समझने वाले की वाहवाही ही हमारा इनाम था। बात आयी-गयी हो गई।

दूसरी मुलाकात 2015 में मेरे नसीब में आयी, जब मुझे ‘नई धारा’ कार्यालय से 2015 के लिए मेरी एक कहानी ‘कफ़न के बाद’ हेतु ‘नई धारा रचना सम्मान’ से पुरस्कृत करने की सूचना मिली। भव्य समारोह का आयोजन किया गया था। निर्धारित तिथि पर मैं उपस्थित था। पुरस्कार वितरण का कार्यक्रम उनके बोरिंग रोड, पटना स्थित ‘सूर्यपुरा हाउस’ में ही आयोजित किया गया था। इस समारोह में कई साहित्यकारों को आमंत्रित किया गया था। वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह, पद्मश्री उषाकिरण खान, व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय के साथ मुझे भी सम्मानित किया गया। दर्शकदीर्घा में वरिष्ठ कवि अरुण कमल, ‘पाखी’ के संपादक प्रेम भारद्वाज सहित काफी संख्या में लोगों की उपस्थिति थी। अम्मा जी से भी मुलाकात हुई। उनका आशीष मिला। व्यस्तता के कारण उस दिन बहुत बात नहीं हो पाई। कार्यक्रम की समाप्ति के बाद अगली मुलाकात की आस लिए वहाँ से रवाना हुआ। 2016 का नई धारा सम्मान दिल्ली में आयोजित किया गया था, किसी कारणवश मै उसमें शामिल होने नहीं जा पाया।

अम्मा जी से अगली मुलाकात का वर्ष 2017 था, जब ‘नई धारा रचना सम्मान’ देने के लिए बेली रोड के तारामंडल सभागार में आयोजन किया गया था। दर्शक दीर्घा में कुछ देर तक अम्मा जी के साथ मुझे भी बैठने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अधिक व्यस्तता के कारण कुशलक्षेम से बात आगे नहीं जा पाई। हर आने-जाने वाले बड़े साहित्यकारों/आमंत्रित अतिथियों से उनका मिलना-जुलना चलता रहा। लगा ही नहीं कि 86 वर्ष के आसपास जा चुकी हैं। बात कम करती थीं लेकिन नजर हर चीज पर होती थी। नजर पड़ते ही मुस्कुराते हुए बैठने का इशारा करतीं। अतिथि जा चुके थे। मैंने भी अगली मुलाकात तक के लिए उनसे विदा लिया।

2018 के ‘नई धारा’ सम्मान का आयोजन भी दिल्ली में ही होना था, उम्मीद थी कि मुझे भी शामिल होने का अवसर मिलेगा और अम्मा जी से मुलाकात का भी। लेकिन विभागीय व्यस्तता के कारण दिल्ली के आयोजन में जाना संभव नहीं हो पाया। लेकिन यह निश्चित था कि अगले वर्ष का आयोजन तो पटना में ही होना है। हुआ भी वही। 2019 के ‘नई धारा रचना सम्मान’ का आयोजन ‘बिहार म्यूजियम’ में आयोजित था। अम्मा जी से फिर मुलाकात हुई। अब तक उनकी याददाश्त में मेरा नाम भी अंकित हो चुका था। पहली बार उन्होंने कैसे हैं शंभु जी! से संबोधित किया। कल तक उनकी नजर में मेरी पहचान ‘कानों में कँगना’ के एक निर्माता के रूप में थी। नब्बे पार के बाद उनके जेहन में मेरा नाम आया। कार्यक्रम के मुख्य सूत्रधार और आयोजक ‘नई धारा’ के संपादक डॉ. शिवनारायण ने अतिथियों को धन्यवाद ज्ञापन का भार मुझे सौंपा था। कार्यक्रम समाप्त हुआ। मंच से नीचे आते ही अम्मा जी का दोनों हाथ मुझे आशीष देने को उठा। मैंने पुनः उन्हें प्रणाम किया कि अगले वर्ष आयोजन चाहे दिल्ली में हो या पटना में, अम्मा जी से मुलाकात तो होगी ही, क्योंकि 2018 के दिसंबर में मैं अवकाश ग्रहण कर चुका था। लेकिन दुर्भाग्यवश कोरोना के कारण 2020 के नई धारा सम्मान का आयोजन नहीं हो पाया। सोचा अब तो 2021 के आयोजन में ही मुलाकात होगी, लेकिन किसे पता था कि अब उनसे मिलना नहीं हो पायेगा। खबर आई कि अम्मा जी ने 27 जुलाई 2021 को 90 वर्ष की आयु में हमें अलविदा कह दिया है, सदा-सदा के लिए। अम्मा जी से तो अब मिलना नहीं हो पायेगा, लेकिन स्मृति पटल पर उनके साथ की यादें बनी रहेंगी, हमेशा-हमेशा के लिए।

शीला जी साहित्यकार नहीं थीं लेकिन तीन पीढ़ियों की साहित्यिक विरासत की गवाह थीं। साहित्य और साहित्यकारों के प्रति उनके मन में असीम आदर का भाव रहता। उनका चले जाना एक व्यक्ति विशेष का अवसान नहीं है, तीन पीढ़ियों के बीच की कड़ी का टूटना है। साहित्यकार न होते हुए भी एक साहित्यिक परिवार के संरक्षक का अवसान तो है ही, जिसकी क्षतिपूर्ति संभव नहीं है।


Image Source : Personal collections of Pramath Raj Sinha and Family