फणीश्वरनाथ रेणु मानव मुक्ति के कथाकार

फणीश्वरनाथ रेणु मानव मुक्ति के कथाकार

प्रेमचंद के पश्चात हिंदी के सर्वश्रेष्ठ कहानीकार से मेरा प्रथम परिचय ‘उदयाचल’ में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी के द्वितीय पुत्र केदारनाथ सिंह जी के सान्निध्य में हुआ। कहानीकार फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ का जन्म मार्च 1911 में बिहार के अररिया जिले के औराही हिंगना गाँव में हुआ था और देहावसान 11 अप्रैल, 1977 में हुआ।

फणीश्वर नाथ रेणु की कहानियों का परिवेश और प्रकृति दर्शाता है कि ‘रेणु’ में बचपन से ही कहानी गढ़ने की कला थी। उनकी अवस्था जब छह-सात साल की थी, उन्होंने अपने पिता जी को अपने संबंध में बड़ी सहजता से एक अद्भुत कहानी सुनायी। पिता जी ने माँ को बुला के कहा था, ‘सुनो जरा, यह क्या कहता है?’ तब रेणु ने माँ से साफ शब्दों में कह दिया था, ‘तू मेरी माँ नहीं। मेरी माँ ने मुझे एक मिट्टी की हंडी में बंद कर, नदी में डाल दिया था। बहते-बहते हंडी एक घाट पर जा लगी। और वहीं से तुम मुझे ले आई। ‘रेणु ने आगे बताया’, मुझे पुनर्जन्म की बात भी याद है।… मैं स्कूल में पढ़ता था। अहा! कितना सुंदर था हमारा स्कूल! चारों ओर रंग-बिरंगे फूलों की क्यारियाँ। पोखरे में पुरइन के फूल। एक दिन मैं फूल ‘तोड़ने’ के लिए…। और तभी उनकी माँ चीख पड़ी थी और घनघोर आर्य समाजी पिता ने एक कट्टर सनातनी को बुलाकर पूजा-पाठ और पुरश्चरण की व्यवस्था करवायी थी।’

रेणु ने इस प्रसंग का उल्लेख अपनी आत्म-रचना ‘पांडु-लेख’ में किया है। सच यह है कि यह उनकी गढ़ी हुई पहली कहानी थी। इसका प्रभाव भी व्यापक स्तर पर परिलक्षित हुआ। उन्हें बचपन से ही कथा-कहानी सुनने का शौक था। वे अपनी दादी और गाँव के बूढ़े-बुजुर्गों से पूर्णिया क्षेत्र के जनजीवन में रची-बसी कहानियों को अपनी समृति में बसा चुके थे। यही आगे चलकर कथा-साहित्य में उनकी पूँजी सिद्ध हुई। उनमें स्मरण की विलक्षण शक्ति थी–एक-एक घटना ही नहीं, चरित्रों के हाव-भाव, मुद्राएँ भी याद रखते थे तथा लोक-गीत भी। उन्होंने अपने कथाकार होने के बारे में लिखा है–‘बचपन से ही मुझे कथा-कहानी सुनने और गुनाने का शौक रहा है। बनने का शौक तो बहुत बाद में चलकर पैदा हुआ और वह भी शायद इसलिए कि बचपन से ही इतनी तरह के लोगों को नजदीक से देखने-समझने का मौका मिला कि बाद में मैंने महसूस किया–मेरा प्रत्येक परिचित अपने आप में अनगिनत कहानियों की खान। बस, फिर क्या था, कलम उठाई और कथा बुनने के काम में लग गया।…इस बीच स्कूली-जीवन और उसके बाद में मेरे अनगिनत परिचित-मित्र, गाँव-घर की घटनाएँ मेरी कहानियों का ताना-बाना बनी है और मैंने उन्हीं से अच्छी-बुरी कहानियाँ बुनी हैं।’

रेणु साहित्यकार होने के साथ-साथ मूलतः किसान थे। उनके परिवार की जीविका का एकमात्र साधन खेती-बाड़ी रहा है। इसीलिए वे खेती करने में कविता का आनंद पाते थे। कभी-कभी उन्हें एक बीधा खेत में खेती कर लेना पाँच लेख और पाँच कहानियों से ज्यादा फायदेमंद लगता है। स्पष्ट है कि गाँव और किसान-जीवन उनके लिए साहित्य-लेखन से कम महत्वपूर्ण नहीं है। यही कारण है कि उनका रचनाकार मन कभी आधुनिकतावादी या शहरी पूरी तरह से नहीं हो पाया। इसलिए वे ‘ऑरिजन ऑफ फेमिली’ पढ़ने के बावजूद सब दिन अस्सी प्रतिशत सनातनी ही रहे। वे स्वयं माना करते रहे हैं कि मैं ‘कु-संस्कारों में पला अंधविश्वासी हूँ’। रेणु के शब्दों में ‘बिहार की राजनीति क्षेत्रीय है’। उनकी हलचल का प्रभाव केंद्र पर भले न हो, उत्तेजना पूर्ण होने के कारण प्रादेशिक ढंग से वह अवश्य महत्त्वपूर्ण है। राजनीति के सतत नाटक को जीवंत ढंग से उपस्थित करने वाले रेणु अपनी कहानियों में भी मुखर हैं। उन्होंने कहानियाँ अपने गाँव-घर से ही सुनी है। उनका कहना है–‘अपने बारे में आज कुछ लिखते समय करीब आधा दर्जन लंगोटिया यारों की याद आ रही है–वे किसानी करते हैं, गाड़ीवानी करते हैं, पहलवानी करते हैं, ठेकेदार हैं, पान की दूकान चलाते हैं, शिक्षक हैं, एम.एल.ए. हैं, भूतपूर्व क्रांतिकारी और वर्तमान काल के सर्वोदयी हैं, व झील हैं, मुहर्रिर हैं, चोर हैं और डकैत हैं। वे सभी अपना करते हुए मेरी रचनाओं को सदा खोजकर पढ़ते हैं। वे मेरी कहानियों में, मेरे उपन्यासों में, मेरे जीवन में घटनाओं की छायाएँ ढूँढ़ते रहे हैं, मिलने पर आपस में बाते करते हैं। और, कभी-कभी मुझे छोड़कर कहते हैं, ‘साले!…वह जो लिखा है ‘वहाँ’ वाली बात हैं न? इस्स’ उस बारे में मेरे एक पूज्य शिक्षक ने एकांत में पूछ ही दिया था–‘अच्छा एक बात बताना तो?…यह हकीम खाँ के आत्महत्या करने वाली घटना की कहीं कोई छाया–अथवा उस घटना के मूल में जो कहानी थी–सो…? अपना यशस्वी लेखक का मुखौटा लगाकर मैं उनके प्रश्न पर विज्ञजनोंचित हँसी नहीं हँस सका। सकपकाकर इतना-सा बोला ‘वही तो…तो नहीं क्या…शायद, उस अप्रिय और मूर्खतापूर्ण घटना की ग्लानि के कारण मैं उसे भूलता, भूलता गया। और सच कहता हूँ सर, आपने कहा तो अचानक मुझे याद आई…अभी। यही कारण है कि उनकी कहानियों में स्वभाविकता है। कथानक जाना-पहचाना है। पात्र हमारे आपके बीच के हैं। कहानियों में उस परिवेश और मिट्टी की घड़कने साफ-साफ सुनाई पड़ती हैं। पाठक को लगता है कि रेणु हमारे हैं, हमारे ही दुःख-दर्द, आशा- आकांक्षाएँ, स्वप्न, संभावनाएँ इन कहानियों में व्यक्त हुई है।

रेणु ग्रामीण जीवन के यथार्थ कहानीकार हैं। वे ग्रामीण जीवन में टूटते-बिखरते और जीवित मानवीय संबंधों के कथाकार हैं। नई कहानी के दौर में गाँव के जीवन पर कहानियाँ लिखने वाले और भी कहानीकार थे। उनकी कहानियों में ‘अहा! ग्राम्यजीवन भी क्या है?’ का जो भाव है, वह रेणु की कहानियों में नहीं है। वे न तो गाँव के विरह में व्याकुल कथाकार हैं, न गाँव की जड़ता का गूढ़ माननेवाले। उनकी दृष्टि ग्रामीण जीवन के संपूर्ण यथार्थ पर है, ‘जिसमें फूल भी है शूल भी, कीचड़ भी चंदन भी।’ नई कहानी में भोगा हुआ यथार्थ का सिद्धांत प्रचलित था। व्यवहार में भोगे हुए यथार्थ के सिद्धांत के कायल थे, न भोग के यथार्थ के कहानीकार! उनकी कहानियों में जो रोमांटिक तत्व हैं, उनका एक स्त्रोत नई कहानी है और दूसरा बंगला का कथा-साहित्य। नई कहानी के काल में साहित्य की राजनीति से अलग रहने की जो हवा चलती थी, उसका असर इन पर भी पड़ा, यद्यपि वे जीवन में राजनीति से परहेज करने वाले नहीं थे। जब हिंदी-साहित्य में अस्तित्व की आँधी चल रही थी, तब भी वे उससे अप्रभावित रहे। उनकी कहानियों में न तो कहानी वाली मोहपरक रंगीनी देखी जाती है, न बाद के मोह भंग के काल का निषेध वाद! उनकी कथा की पृष्ठभूमि है लोकजीवन से गहरी आत्मीयता और लोक-संस्कृति में अटूट आस्था, जिसका प्रमुख स्वर है ‘आदमी’ की तलाश, मानवीयता को प्रश्रय, प्रोत्साहन देना।

रेणु ने शहरी जीवन की भी कथा लिखी है। ‘दीर्घतपा’, ‘जूलूस’ और ‘कलंक मुक्ति’ उपन्यास के साथ अनेक कहानियों में नौकरी-पेशा महिलाओं के जीवन-संघर्ष की व्यथा-कथा। निम्न जीवन वर्गों के छल-छद्म की कथा विद्यमान है उनके अधिकांश कथा-साहित्य की पृष्ठभूमि में। चाहे केंद्र में गाँव या शहर, शोषित, पीड़ित, सामान्य जन, विशेषकर नारी के जीवन के पाखंड, खोखलापन और अमानवीयता हैं। उनकी कहानियों की पृष्ठभूमि में सुखांत एवं दुःखांत दोनों स्थितियाँ हैं–जनजीवन की ट्रेजडी और अभिजात वर्ग की कॉमेडी। प्रमाण के लिए उपन्यासों और कहानियों के साथ 1966 के भयानक सूखे और 1975 की भीषण बाढ़ पर लिखे दो लंबे रिपोतार्ज के संग्रह ‘ऋणजल धनजल’ को देखा जा सकता है। रेणु न केवल जल-प्रलय से ग्रस्त हैं, पीड़ित हैं, वहाँ नदियों में खून की बाढ़ आती है, सर्वग्रासिनी बाढ़। सब कुछ स्वाहा कर देने वाली। नाश कर देने वाली। इसलिए जितेन्द्र ने इरवती से कहा था–‘आपका दुःख मैं समझता हूँ, अनुभव करता हूँ, आपकी नदियों में खून की बाढ़ आई थी। एक अंधवेग, एक पागलपन, एक जुनून। रक्त की धाराएँ ही वहीं…सिर्फ बाढ़ ही नहीं, दावा भी। भयंकर लपटें उठानेवाला। सब कुछ जल गया। धन-संपत्ति, कला-कौशल। मैं उसकी भीषणता की कल्पना कर सकता हूँ, और आप भी कल्पना कीजिए उस भू-भाग की। डायन कोसी के सफेद बलुवाही आँचल पर बिखरे लाखों नए नर कंकालों की कल्पना से आप डर तो नहीं जायँगी…।’ मानव-मुक्ति की साधना-रेणु इन विषम परिस्थितियों के मध्य भी प्यार इनसानियत की परिभाषा गढ़ते हैं। वे मनुष्य के मनुष्यत्व में गहरी आस्था व्यक्त करते हैं–‘इनसान सिर्फ कत्ल और बलात्कार ही नहीं करता। इनसान गढ़ भी सकता है। गढ़ रहा है। बना रहा है। रचना कर रहा है–समाज के लिए, अवाम के लिए। वीरान को बसाने के लिए, वंध्या धरती को शस्य श्यामला बनाने के लिए?…’

रेणु की कहानियों की पृष्ठभूमि है मानव-मुक्ति की विराट से कल्पना। समाज को मानवीय और मनुष्य को सामाजिक बनाना ही मुक्ति का एकमात्र पंथ है। जब मनुष्य को यंत्र परिचालित करेगा, मानव एक यंत्र का पुर्जा भर बन जाएगा, मस्तिष्क उस पर हावी हो जाएगा, तो जीवन-उपभोग का मूलमंत्र ही हम भूल जाएँगे। तब हमारी मिट्टी में सांस्कृतिक सोना नहीं फल सकता। प्राण की अनुभूति का संगीत नहीं सुनाई पड़ता, इसलिए आवश्यक है मनुष्यता को जिलाने, बचाने और संबंधित करने के लिए हम मनुष्यता का गीत गाएँ। प्यार की खेती करें। डॉ. मैनेजर पांडेय का कहना उचित है–‘रेणु का उदेश्य गाँव के जनजीवन के यथार्थ, संघर्ष, अनुभव और मानवीय संबंधों की अभिव्यक्ति है। रचनाकार के रूप में उनके सामने समस्या है इस अभिव्यक्ति को अधिकाधिक प्रमाणित और प्रभावशाली बनाने की। जल जीवन के यथार्थ और अनुभव की प्रमाणिक अभिव्यक्ति के लिए रेणु ने उस यथार्थ और अनुभव संसार से अभिन्न रूप से जुड़ी भाषा का सहारा लिया है।’ उनके पीछे जनजीवन का यथार्थ और अनुभव की संपन्नता का बल है। उनकी रचनाशीलता इस बात में है कि उन्होंने यथार्थ और भाषा के आत्मीय संबंध को पहचानते हुए जन जीवन के यथार्थ और अनुभव को अधिक विश्वसनीय बनाया है और बोल-चाल की भाषा को अधिक व्यंजक।

उनके रिपोर्ताज ‘एकलव्य के नोट’ पर ध्यान दिया जाए, तो पता चलता है कि परानपुर गाँव का सर्वेक्षण कितनी कुशलता एवं संवेदनशीलता के साथ किया गया है। गाँव कितनी तेजी से बदल रहा है। कैसे उसकी परंपरा एवं मूल्यवत्ता में क्रांति आ रही है। मूल्य बदल रहे हैं।… इधर कुछ दिनों से लगता है कि दुनिया तेज रफ्तार से भागी जा रही है। दिशा-ज्ञान की बातें पीछे करूँगा…चाल की तेजी का अनुभव सभी कर रहे हैं।… लैंड सर्व सेंटलमेंट। जमीन की फिर से पैमाइस हो रही है। साठ-सत्तर साल बाद। भूमि पर अधिकार। बटैदार का जमीन पर सर्वाधिकार हो सकता है, यदि यह साबित कर दे कि जमीन उसी ने जोती बोई है।… चार आदमी (खेत के चारों ओर से गबाह जिसे ‘अरिया गवाह कहते हैं) कह दे, बस हो गया। बिहार टेन सी एक्ट की दफा 40 के मुताबिक लगतार तीन साल तक जमीन आबाद करने वालों को ‘अकोपेंसी राइट’ हासिल हो जाता था। जमींदारी प्रथा खत्म करने के बाद सरकार ने अनुभव किया–पूर्णिया जिला में एक क्रांतिकारी कदम उठाने की आवश्यकता है…जिला में जमींदार राजाओं की जमींदारी का विनाश आवश्यक हुआ। किंतु हिंदुस्तान के सबसे बड़े किसान यहीं निवास करते हैं…गुरुवंशी बाबू जमींदार नहीं–किसान हैं, दस हजार बीघे जमीन हैं। दो हवाई जहाज रखते हैं…जमींदारी प्रथा समाप्त होने के बाद भी हर साल फसल कटने के समय एक-डेढ़ सौ लड़ाई-दंगे और चालीस-पचास ‘महर’ होते रहें, तो फिर से जमीन की बंदोबस्ती की व्यवस्था की गई है। एक विशाल आँधी की प्रतीक्षा में ‘क्षयिष्णु’ समाज, समाज के गाँव, गाँव के लोग खड़े हैं’ रेणु की कहानियों में इसी जमींदार के विरुद्ध आवाज उठाते भूमिहीन किसानों, मजदूरों, आम आदमियों को देखा जा सकता है। कई जगह वर्ग-संघर्ष उभरा नहीं है। रेणु का कहानीकार निरंतन सजग है कि ‘आम आदमी’ को खुशिहाली मिले। उनके मुरझाए होठों पर हँसी खिले। परती, वीरान, उसर और बंध्या धरती पर फिर से हरियाली आए–गुलाब खिले, खेती हो, फसल हो। यह एक प्रतीक है अंधकार से लड़कर प्रकाश पाने का। उनमें जीवन के प्रति आशा-विश्वास प्रभात जगे। ग्रामीण जीवन यही समस्याएँ रेणु के अचेतन मन में बैठी रहती हैं और कथा का ताना-बाना रेणु ने जो जीवन जीया है, भोगा है, जिससे सीधे साक्षात्कार किया है, उसी प्रेरणा की पूँजी से अपनी कहानियों की सर्जना की है। वह जिसके लिए ‘लाखों’ के बोल सहता है,’ उसी के लिए लिखता है। उसी का कहानीकार है।

1949 ई. में पूर्णिया से रेणु ने ‘नई दिशा’ पत्रिका का प्रकाशन किया, जिसके संपादकीय में उन्होंने घोषणा की–‘सुराज हुआ है जरूर, लेकिन हमारे लिए नहीं हुआ है। वह सुराज हुआ है बिड़लाओं के लिए, टाटाओं के लिए, डालमियाओं के लिए, देशी गोरों और जमींदारों के लिए, भ्रष्टाचारियों के लिए। यह जनता का सुराज नहीं। महाभारत छिड़ा हुआ है, जनता का संघर्ष अभी जारी है। दरिद्रता, भूख और रोगों से अभी मरने वाले एक-एक प्राणी को आज हम शहीद कहते हैं, क्योंकि दुश्मनों के उन अस्त्रों से जूझनेवाले मारनेवाले वीरों को हम ‘वर्ग संघर्ष’ में लड़ने वाला सिपाही समझते हैं। इस भ्रष्टाचार के आलम में घुट-घुट कर मरने से अच्छा है एक ही बार कुछ करना या करते-करते मर जाना, इससे पता चलता है कि उनमें प्रारंभ से ही समाज के दलित-पीड़ित और उपेक्षित वर्ग के लिए न केवल अपार सहानुभूति थी, वरन् उनके लिए जूझने, डटने, लड़ने का दम-खम भी था। गाँव और वहाँ के लोगों की नाना समस्याओं ने उन्हें कहानी की प्रेरणा दी। ग्रामीण संस्कार उनकी कहानियों के वर्ण-वर्ण से प्रगट होता है; यह टिप्पणी उचित ही है–‘रेणु की कहानियों में ग्रामांचलों का लोकगीत, लोकजीवन, परंपराएँ, रूढ़ियाँ, पंचायतें, सड़कों की धूल, नौटंकियाँ, धूप, रोशनी और वह सब कुछ है, जो ग्रामांचलों में है।’


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