अमर संदेश

अमर संदेश

यह कविता महाकवि वर्ड्सवर्थ की ‘ओड टू इमौरटेलिटी’ का भावानुवाद है। अनुवाद में, जैसा कि पाठक स्वयं देखेंगे, कहीं-कहीं स्वतंत्रता से काम लेना पड़ा है। भाव-साम्य की रक्षा के लिए शैली में थोड़ा बहुत हेर-फेर करना आवश्यक हो जाता है। किंतु फिर भी अनुवादक को विश्वास है कि वह मूल कविता के गौरव की रक्षा में सफल हो सका है। –संपादक

बीत चुके इतने दिन जैसे पर कल की ही बात,
नहीं मिटा पाया उस छवि को क्रूर समय का हाथ।
प्रिय लगता था मुझे क्षुद्रतम तृण-तृण कण-कण
धरती का विस्तार, चपल निर्झर का कल-कल;
बिखरा हो जैसे अनिंद्य सौंदर्य धरा पर
देख, पुलक से भर आता था मेरा अंतर
मूर्तिमान-सा स्वप्न-लोक नयनों का उज्ज्वल;
प्रिय लगता था मुझे मनुज-जीवन का क्षण-क्षण।

2

किंतु आज तो श्री-हत से लगते भू-अंबर
उतर गए से जैसे रंगों के अवगुंठन–
अब भी सतरँग इंद्रधनुष रँग जाता बादल,
अब भी फूलों में सुवास, झरनों में कल कल,
अब भी हँसता चाँद, धरा पर सुधा बरसती,
सरिता की गोदी में चुप सोता तारक-दल,
प्रात लुटा देता रवि भू पर सोना उज्ज्वल,
पर मेरी ये आँखें रहतीं सदा तरसतीं–
पुन: देख सकने को वह छवि, वह आकर्षण
भरे-पुरे थे कभी लगे जिससे भू-अंबर

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आज : चतुर्दिक बिखरा जब वासंती कंचन
गूँज रहा अमराई में पिक का अभिनंदन
सुनो, दूर बज रही कहीं ग्वाले की वंशी
आप्लावित मधु-रव से सारे उपवन-कानन,
क्यों फिर मेरे ही मन में इतना सूनापन?
नहीं, नहीं होने दूँगा अपने को कायर!
कोकिल के सँग-सँग तू भी गा, ओ मेरे मन!
सुन, करता जय घोष कोटि कंठों से निर्झर
प्रतिध्वनित जिससे उपत्यकाएँ, गिरि-गह्वर
मदिरालस वातास थकी कर सुरभि-संवहन
उड़ जाएँगे फूल खोल जैसे चित्रित पर
कैसे आज फेर लूँ मैं ही अपने लोचन!

4

गा री कोकिल! बरसें अग्नि-स्फुलिंग नव पावन
क्षार क्षार हो जो कुछ मुझ में जीर्ण पुरातन
मधुऋतु के स्पर्शों से भर जाए मेरा मन
नाचो अरी तितलियों, भँवरों गाओ, गाओ
आज मुझे भी अपने सँग उन्मत्त बनाओ
साथ मुझे भी बहा ले चलो कहीं हवाओं
कहाँ आज तक धरती ने ये रंग छिपाए
चकित निष्पलक देख रहीं हैं दसों दिशाएँ
यह अपार ऐश्वर्य देख सुरपति शरमाए
नई वधू-सी वसुधा फूलों से अवगुंठित
बाट जोहती जैसे प्रिय की उत्सुक, सचकित
छलके-से पड़ते नयनों से प्राण उल्लसित
नहीं गई पर मेरे मन की हाय उदासी
कैसे इस उत्सव में मैं आ पड़ा प्रवासी
नहीं मिल सका मुझको तो विश्राम यहाँ भी
मैं तो निकला हूँ लौटा लाने को वह क्षण
जिसमें स्वप्नाविष्ट लगा था मुझको कण कण
भू का, अकथ पुलक से जब भर आया था मन
कहाँ किधर उड़ गया हाय वह भोला बचपन!

5

आ पहुँचा हूँ कहाँ अपरिचित नगरी में अनजान
क्या सचमुच ही आज स्वयं मैं खो बैठा हूँ ज्ञान!
एक नींद है शायद यह ज़िंदगी; तभी तो
मुझको कुछ भी पता नहीं अपने उस घर का
जहाँ–युगों पहले, जाने किस रूप-नाम से–
मेरे निर्माता ने मुझको जन्म दिया था;
जहाँ हृदय में मेरे पहली बार
आँख खोली थी मेरे अवचेतन ने;
किंतु आज भी स्पष्ट देख सकता उस शिशु को
जो विमान पर शुभ्र जलद-खंडों के सुंदर
पहन रश्मियों के दुग्धोज्ज्वल वसन सुकोमल
मंगल-वाद्य लिए गाती किन्नरियों के सँग
उतरा था–
मनुजों की दुनिया में
कुछ अपना समय बिताने।
सचमुच भू पर स्वर्ग उतर आया था उस दिन।
बीते वासर मास,
उड़ गए वर्ष, और फिर
सीख एक दिन ली उस नन्हें अभ्यागत ने
धरती की भाषाएँ, संस्कृतियाँ मानव की;
बढ़े नए संबंध, नए परिचय दुनिया से,
बढ़ने लगी मित्रताओं की संख्या दिन दिन,
नहीं पता था लेकिन उस भोले प्राणी को
उसके चारों ओर उठ रही थीं, वय के ही साथ,
नई काराओं की ऊँची, अदृश्य दीवारें दुर्जय।
पर वह खुश था अपनी नई-नई खुशियों में,
चाहे जिस क्षण भी बस पलक उठाने से ही
देख एक पल में सकता था उस प्रकाश को
जिसके प्रखर-कणों से, कुछ ही बरसों पहले
उसके प्राणों का पहला निर्माण हुआ था,
और आज भी जिसका तेज अनिद्य, अन्यतम
छिटक रहा था ठीक शीश के ऊपर नभ में।
समय भागता गया किंतु अपनी द्रुतगति से।
और एक दिन
देखा विस्मित नयनों से अल्हड़ बालक ने
जैसे सब कुछ नया-नया सा था धरती पर,
नई चमक से दृप्त हो उठे चंचल लोचन
नए रक्त से स्वयं भर गईं युवा-शिराएँ
जाने किस मुहूर्त में उर में जाग उठी थी
किसके साहचर्य की अद्भुत नई वासना
बाँध लिया था उसको नए-नए पाशों ने
उलझ गई थी उसकी बाँहों में दो बाहें
फूलों-सी सुकुमार, भरी विद्युत-स्पर्शों से।
दूर निकल आया था सचमुच घर से राही
भूल चुका था–देख नई इस चकाचौंध को
अपने ही आलोक-कोष जो
कभी बहुत पहले उसको उपहार मिले थे।
केवल कभी-कभी विस्मृति के अंधकार में,
कौंध एक पल जाती थीं स्वर्णाभ बिजलियाँ
जो अब भी लगती थीं कुछ-कुछ पहचानी-सी
और लौट आने का पथ इंगित करती थीं।
और आज वह दिन है जब मैं सोच रहा हूँ
क्या मेरा ही था सचमुच वह भोला बचपन
एक झलक भी मुझको आज नहीं मिल सकती
अपने उस अक्षय प्रकाश की
जिसके बीच कभी मैंने आँखें खोली थीं।
एक नींद ही तो है धरती का यह जीवन
हाय तभी तो
मुझको कुछ भी पता नहीं अपने उस घर का
जहाँ–युगों पहले जाने किस रूप नाम से
मेरे निर्माता ने मुझको जन्म दिया था।

6

भर देती है धरा नई पुलकों से जीवन
सहज खींच लेते मन को अभिनव आकर्षण,
बिन माँगे ही मिलते स्नेह-दुलार;
थके पथिक को मिलता जब स्वागत पथ-पथ पर,
मंजिल बन जाती तरु की छाया ही सुखकर,
अद्भुत बंधन है सचमुच संसार।

7

भोले बचपन की बातें भी भोली कितनी;
माँ के चारों ओर बना कर दुनिया अपनी
खुश है छोटा-सा बच्चा–
पा नए खिलौने,
लंबे–बौने–
मोटा साहूकार और बेचारा दीन किसान
पैदल वीर सिपाही, घोड़े पर बाँका कप्तान
देखो निकल रही बारात
गुड्डे की शादी है कितनी धूम-धाम के साथ
देता दूल्हे को दहेज में मोटर-रेल-जहाज
बच्चे के सुख का तो कुछ भी अंत नहीं है आज
माता के नयनों का तारा,
आशा, मूर्त पिता की
कहाँ मिलेगी तुलना, तुम्हीं
बताओ, इस ममता की
नहीं सीख पाया है अब तक शिशु धरती की भाषा
लेकिन जैसे खेल-खिलौनों में ही अपने
प्रतिबिंबित पाता–जीवन की आशा और निराशा
मनुजों की दुनिया के झूठे-सच्चे सपने
किंतु बीत ही जाएगा भोला बचपन भी
और एक दिन नई बसेगी दुनिया मन की
तब होंगे इस रंगमंच पर नूतन अभिनय
औ’ सजीव होंगे गुड्डे-गुड़ियों के परिचय
टूट-टूट कर पुन: कसेंगे नूतन बंधन
नई मित्रताएँ पाएँगी रोज़ निमंत्रण
नए नए सपने देखेंगे प्रेयसि-प्रियतम
इसी भाँति चलता जाएगा जीवन का क्रम
इसी भाँति चलता आया है जीवन का क्रम
नहीं जगत के व्यापारों में कुछ भी नूतन
सदा अनुकरण-मात्र रहा है मानव जीवन
धरती पर नूतनता केवल नयनों का भ्रम

8

ओ नन्हें इंसान!
तुझे मालूम नहीं है
अपना ही माहात्म्य, स्वयं अपनी प्रतिभाएँ,
वेद और विज्ञान जगत के मिथ्या हैं सब;
सच्चा है तो एकमात्र तेरा ही दर्शन;
नहीं समझता तू छलछंद भरी भाषाएँ
नहीं दीख पड़ते तुझको जीवन के कल्मष;
तन्मय रहता तू तो अपनी ही दुनिया में
दावा करता प्रतिपल हर्षित चकित दृगों से
वह अनिंद्य छविलोक, जहाँ पर जन्मभूमि है
तेरी प्राण चेतना की तेरे जीवन की,
अथवा सुनता रहता जलद-गर्जनाओं-सा
स्वर उन सागर की लहरों का कभी जिन्होंने
लाकर छोड़ दिया था तुझको सिकता-तट पर
खोज-खोज कर हार चुकी है जिसको दुनिया
ईश्वर की रचनाओं का वह सत्य सनातन
प्रतिपल होता है तेरे सम्मुख प्रतिलक्षित।
और सदा ही देखा करते हैं नतमस्तक
स्वर्ग और अपवर्ग सभी तेरे इंगित को
समझ सका है तू ही तो जीवन का इति अथ
पंडित औ’ ज्ञानी तो बस पोथी पढ़ते हैं।
फिर भी हाय न जाने क्यों है तू इतना नादान
दौड़ रहा मृगजल के पीछे, मरुथल से अनजान
नहीं ज्ञात हैं तुझे अभी छलछद्म जगत के
नहीं चुभे हैं अभी पगों में कंटक पथ के
क्यों तू उन ज्वालाओं में जलने को उत्सुक
लक्ष्यहीन अंधे पथ पर चलने का इच्छुक
क्षणभंगुर हैं अरे स्नेह-संबंधों के सुख
सारहीन तेरे अपने गौरव के सम्मुख
नहीं सुन रहा क्या तू अपने मन की ही आवाज़
जो इस भाँति उलझता जाता विष-पाशों में आज।

9

परिवर्तित हो जाते हैं फिर तो जीवन के वेश
बचपन के गौरव की कुछ ही स्मृतियाँ रहतीं शेष
छुप जाता आलोक, जलधि गर्जन होता खामोश
भूली भटकी यादों पर करना पड़ता संतोष
पर, खो कर भी मैं अपना वह सुंदर बचपन
वह स्वछंद हँसी, औ’ वह निश्छल भोलापन
दुखी नहीं हूँ,
मैं तो अन्य व्यथा से कातर
विह्वल करता मुझे एक ही सोच निरंतर
आज नहीं वे नयन कोटि प्रश्नों से चंचल
आज नहीं प्राणों में उस शिशु के कौतूहल
वह अलभ्य को दौड़ पकड़ने की तत्परता
अभिनव स्पर्शों से मन भरने की आतुरता
तम को चीर देखने वाली दृष्टि तीक्ष्णतम
अनुभव-संग्रह की उत्कट आकांक्षा दुर्दम
वह शांति : अनादि, अनंत, जलधि के तल-सी
बुद्बुद् से वासर-मासों-वर्षों के क्रम
यह कोलाहल, संघर्षों का भीषण स्वर
सब कुछ सुनने वाले कानों का संभ्रम
मैं काश आज लौटा सकता उन घड़ियों को
जिनमें मेरे प्राणों को पहला प्यार मिला
मैं भूल न जाऊँ अपने जीवन दाता को
मुझको अनगिन सुख-सुधियों का उपहार मिला
जो कुछ भी मेरे जीवन में आलोकित है
वह सब मुझको उस शिशु के हाथों दान मिला
आशीर्वाद यह सब उस महिमामय का ही
जो कुछ मुझको जग में आदर सम्मान मिला
और कर चुका हूँ अब यद्यपि जीवन को स्वीकार
मिले मनन के लिए आज भी मुझको कोटि विचार
अब भी जब तब सुन पड़ता है मंद्रघोष गंभीर
सागर की उन लहरों का जिन पर मेरा जलयान
आ पहुँचा था बहुत दिनों पहले तट पर अनजान
अब भी जब तब दिख जाता वह स्वर्णिम-सैकत-तीर

10

नाचो अरी तितलियों, भँवरो, गाओ गाओ
आज मुझे भी अपने सँग उन्मत्त बनाओ
साथ मुझे भी बहा ले चलो कहीं हवाओं
नहीं लौट पाएगा यद्यपि वह पावन क्षण
वह वंशी का मधुरव, वह वासंती कंचन
दुखी नहीं होगा लेकिन फिर भी मेरा मन
अगर सनातन हैं जीवन के शिव औ’ सुंदर
अविच्छिन्न हैं अगर रहे मेरे निशि-वासर
तो क्यों व्यर्थ दुखों से होऊँ व्याकुल कातर
अब और न रोऊँगा मैं अपने दु:खों पर
दुख में तप कर ही मुझको सच्ची भक्ति मिली
मैं देखूँ, समझूँ मानव की दुर्बलता को
मुझको विचार की और मनन की शक्ति मिली
संसृति के तृण-तृण कण-कण सब बँधे एक ही तार
एक राग की सब में अविरल दौड़ रही झंकार

11

ओ धरती के विस्तारों, ओ शीतल कुंजो,
ओ मंथर गति सरिताओ, ओ चंचल झरनो,
ओ गर्वोन्नत हिमशृंग, चाँद ओ मधुवर्षी,
ओ बाल सूर्य की स्वर्णोज्ज्वल तमहर किरणों,
मैं साथ तुम्हारे तब भी था औ अब भी हूँ
मैंने जो भी सीखा पाया सब तुमसे ही
था प्यार तुम्हारा ही जिसमें मैं पला बढ़ा
अब भी जो कुछ भी आशा है सब तुमसे ही
मैं भूल चला था हाय तुम्हारी करुणा को
पर तुमने मुझे सुमति दी, सत्पथ दिखलाया।
मैं देख चुका हूँ जीवन की नश्वरता को
मैं देख चुका हूँ छल के पाशों की माया
यह दया तुम्हारी ही थी जो मैं लौट सका।
अब कभी नहीं फिर साथ तुम्हारा छोड़ूँगा
मुँह मोड़ न लेना मुझसे ओ मेरे मित्रो,
अब कभी नहीं मैं भी तुमसे मुँह मोड़ूँगा।
क्या हुआ अगर वह बीत गया भोला बचपन
क्या हुआ अगर वह छूट गया ममतामय घर
मैंने नूतन राहों का अनुसंधान किया–
पाया मैंने विश्राम अनजानी जगहों पर
इतना ही क्या कम है मुझको सामर्थ्य मिली
मैंने उतार फेंके जो अपने अवगुंठन,
स्वागत जागृति के प्रात! आज मैं देख रहा
खुलते रहस्य-लोकों में स्वर्णिम वातायन।
मैं सुन सकता हूँ आज धरा के प्राणों की
धड़कन; मैं पढ़ सकता हूँ फूलों की भाषा,
पाया मैंने संतोष यहीं क्यों व्यर्थ करूँ
मैं अपर सुखों की आज तनिक भी अभिलाषा
इन झरनों के स्वच्छंद गूँजते गानों में
मेरे भटके चरणों को पथ-निर्देश मिला
इन नन्हें नन्हें फूलों की मुस्कानों में
अंतर्हित मुझको एक अमर संदेश मिला।

अनुवादक-सुरत दास


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Artist: Claude Monet
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