जर्मन काव्य की आधुनिक प्रगति

जर्मन काव्य की आधुनिक प्रगति

[जर्मनी की राजनीति ने जो उथल-पुथल देखे उसका प्रभाव वहाँ के साहित्य पर भी पूर्णरूपेण पड़ा। एक समय तक तो दो धाराएँ–नाजीवादी और मानवतावादी विरोधी रूप में कुछ दूर तक साथ-साथ चलती रहीं। आज जर्मनी पराजित है और उसका साहित्य भी पराजित जर्मन-राष्ट्र की आह प्रतिध्वनित करता है। –सं.]

आधुनिक जर्मन-काव्य की प्रगति बीसवीं सदी के प्रारंभकाल से ही अब तक अपने नव-नव रूपों में वेगवती एवं प्रभावपूर्ण दृष्टिगोचर होती रही है। आधुनिक जर्मन कविता में प्रकृति, मनोविज्ञान, वास्तविकता, आदर्श, इतिहास एवं दर्शन का समन्वय परम सुंदर रूप में व्यक्त हुआ है। भौतिकता को कविता में स्थान देते हुए उसे प्रमुख महत्त्व नहीं दिया गया और उसे आध्यात्मिकता से विहीन भी नहीं रखा गया। आधुनिक जर्मन काव्य में भौतिकता यदि शरीर है तो आध्यात्मिकता आत्मा का रूप ग्रहण करती है। उसमें एक के बिना दूसरी वस्तु निरर्थक है। जीवन का सजीव और यथार्थ चित्रण करते हुए भी जर्मन कवि आदर्शवाद और दर्शन की भावना को नहीं भूलते। भूल जाने का उनका स्वभाव नहीं; क्योंकि उनकी सांस्कृतिक परंपरा में दर्शन की भावना को जीवन-शक्ति समझा गया है, वह संसार से विरत नहीं करती, अपितु कर्त्तव्य-शक्ति को जाग्रत करने की प्रेरणा प्रदान करती है। जर्मन दर्शन निराशा की भावना को उत्पन्न नहीं करता, वह जीवन को भविष्य के मार्ग पर अग्रसर होने के लिए नवीन और शक्तिशाली प्रेरणा एवं स्फूर्ति प्रदान करता रहता है। दु:ख, निराशा, कष्ट और बाधाएँ जर्मन जीवन की प्रगति को रोक नहीं सकते। उसमें अदम्य उत्साह, अटल विश्वास, शक्तिपूर्ण साहस और अपार कर्म-शक्ति है। नवचेतन की जाग्रत ज्योति सदैव जर्मन जाति के जीवन को प्रकाशित करती रही है। जर्मन जाति के विगत गौरवपूर्ण इतिहास में यह परंपरा सदैव गतिशील देखी जाती है।

आधुनिक जर्मन कविता में जो प्राणधारा प्रवाहित होती रही है; वह जर्मन जाति के जीवन, हृदय, सिद्धांत, चिंतन, आदर्श, संस्कृति, मनोवृत्ति, सौंदर्यानुभूति और अनुपम मौलिकता का प्रतिनिधित्व करती है। जर्मन काव्य के इतिहास में महाकवि गेटे, शिलर और हाइने ने जिस गौरवपूर्ण आदर्श परंपरा को जन्म दिया, उसे बाद के जर्मन कवियों ने सदैव अक्षुण्ण रखा है। अतीत की भाँति आधुनिक युग में भी जर्मन कविता ने असाधारण प्रतिभा-शक्ति का प्रदर्शन किया है।

बीसवीं सदी के प्रारंभिक जर्मन कवियों में जॉन लुडविग, पॉल हेसे, गर्हार्ट हाप्टमेन और स्टीफन ज़्विग के नाम उल्लेखनीय हैं।

पॉल हेसे की काव्य-पुस्तकों में ‘सलामंदार’, ‘दि फ्यूरी’ तथा ‘दि फेयरी चाइल्ड’ अधिक प्रख्यात हैं। पॉल हेसे की कविताओं में कोमल भावना, सौंदर्य और आदर्शवाद पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं। यद्यपि कवि की प्रेम-काव्य लिखने की ओर विशेष प्रवृत्ति थी, किंतु खंड-काव्य लिखने पर भी उन्होंने ध्यान दिया। पॉल हेसे ने इटली का भ्रमण किया था और वहाँ कुछ समय तक रहकर उन्होंने दांते, बौकैसियो तथा लिओपार्डी की रचनाओं का अध्ययन किया था। उन पर इटली के सुंदर प्राकृतिक दृश्यों, इतिहास और दर्शन का भी प्रभाव पड़ा था। इटालियन कविता के माधुर्य के वह बड़े प्रशंसक थे। स्पेनिश भाषा की काव्य-पुस्तकों का उन्होंने अध्ययन किया था, किंतु रोमन कवियों की रचनाओं के मनन से उन्हें एक विशेष प्रकार की अंतर्दृष्टि प्राप्त हो गई, जो सौंदर्य की तात्त्विक परख में कभी चूकती न थी। यही कारण है कि उनकी कविताओं में सौंदर्य की भावना आकर्षक रूप में व्यक्त हुई है। आदर्शवाद और प्रकृतिवाद के दोनों ही तत्त्व उनके काव्य में समान रूप से दृष्टिगोचर होते हैं। यद्यपि पॉल हेसे की कविताएँ अति सुंदर और आकर्षक हैं, किंतु वे एक महाकवि की रचना-शक्ति का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं।

नोबेल पारितोषिक प्राप्त गर्हार्ट हाप्टमेन केवल उपन्यासकार और नाटक-लेखक ही नहीं थे, अपितु एक कुशल कवि के रूप में भी वे विख्यात हैं। उन्होंने अपनी कविताओं में आदर्श और सत्य के महत्त्व को विशेषता दी है। उनकी कविताओं में आध्यात्मिक रहस्य की भी यथेष्ट झलक दिखाई पड़ती है। कहीं-कहीं उनकी आध्यात्मिकता भारतीय उपनिषदों की आध्यात्मिकता से मिलती-जुलती है। उपनिषद्कारों की भाँति हाप्टमेन ने भी अपने जीवन का लक्ष्य सत्य का अन्वेषण करना और उसे निर्भयतापूर्वक प्रगट करना बना लिया। हाप्टमेन की दो उच्चकोटि की कविताओं ‘ड्रीम पोएम’ और ‘दी स्ट्रेंजर’ पर उन्हें जर्मनी का ग्रिलपार्ज़र-पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

स्टीफन ज़्विग एक प्रतिभाशाली कवि के रूप में विश्व-विख्यात रहे। उन्होंने अपनी कविताओं में हृद्गत भावों को अनुपम शैली में व्यक्त किया है। उनकी कुछ कविताओं में पूर्व जर्मन कवि शिलर की कविताओं का प्रभाव पाया जाता है। जहाँ तक हृदय की कोमल भावनाओं के विश्लेषण और चित्रण का संबंध है, ज़्विग की गणना संसार के श्रेष्ठ साहित्यकारों की श्रेणी में की जाती है। कविताओं के अतिरिक्त उन्होंने नाटक, जीवन-चरित्र तथा आलोचनात्मक पुस्तकें भी लिखीं, जो उनकी विशाल प्रतिभा का निदर्शन है।

स्टीफन ज़्विग जाति के यहूदी थे। फलस्वरूप हिटलर के शासन-काल में इसी कारण उन्हें, उसके अत्याचारों का शिकार बनना पड़ा। उनकी पुस्तकें लाखों की संख्या में जर्मनी में फैली हुई थीं। वे सब ज़ब्त कर ली गईं, जलवा दी गईं और शेष तालों में बंद कर दी गईं। ज़्विग को विदेशों में भागकर घूमते रहना पड़ा। जर्मनी में लाखों रुपए के मूल्य का उनका साहित्यक संग्रहालय नाजियों द्वारा विनष्ट कर दिया गया। उनका सब से बड़ा अपराध यहूदी और आस्ट्रियन होना था। अंत में कष्टों और दु:खों को सहते-सहते वे निराश हो गये और सन् 1942 में ब्रेज़िल में रहते हुए उन्होंने आत्मघात कर लिया। उनका दृष्टिकोण अंतर्राष्ट्रीय था और वे शांतिवादी साहित्यकार थे। अंत में उन्होंने कहा था–“मेरी मातृभाषा की भूमि मेरे लिए समाप्त हो चुकी है और मेरी आध्यात्मिक मातृभूमि यूरोप ने आत्मघात कर लिया है। अतएव साठ वर्ष का होने पर अब मुझ में अपार कष्ट सहन के कारण इतनी शक्ति शेष नहीं कि मैं अब फिर नवीन जीवन प्रारंभ कर सकूँ।” यद्यपि ज़्विग की असाधारण और असह्य स्थितियों ने उन्हें आत्मघात करने के लिए बाध्य कर दिया, किंतु नाजीवाद भी जीवित नहीं रहा। ज़्विग और उनका साहित्य अमर है। उन्होंने अपनी रचनाओं द्वारा घृणा और द्वेष की समाप्ति के लिए सतत प्रयास किया। अपने युग के वे अद्वितीय साहित्य-साधक और असाधारण व्यक्तित्व से संपन्न थे। वे मानवता के उपासक और आदर्श जीवन के समर्थक साहित्यकार थे।

आधुनिक जर्मन काव्य-साहित्य के अन्य प्रारंभिक प्रतिभाशाली कवियों में मैक्स दॉथेंडी, क्रिश्चियन मारगेंसटर्न, अल्फ्रेड मोम्बार्ट, थियोडोर डाब्लर और जॉर्ज हीम हैं। इन कवियों ने अनेक काव्य-पुस्तकों की रचना कर कविता-साहित्य की समृद्धि में प्रशंसनीय योग दिया! इनमें से अधिकांश कवियों ने जर्मन राष्ट्रीयता के भावों को अधिक महत्त्व दिया और जर्मन जाति के पुनरुत्थान के लिए नीत्शे के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया, किंतु काव्य में सौंदर्य-तत्त्व और प्रकृति के चित्रण का भी ध्यान रखा।

वर्तमान युग के कवियों में रैनर मेरिया रिके और हर्बर्ट यूलेन बर्ग विशेष प्रसिद्ध कवि हैं। रैनर मेरिया रिके की प्रारंभिक कविताएँ रहस्यवादी थीं। उनकी युद्धकालीन कविताओं में उग्र राष्ट्रीयता के भाव पाए जाते हैं, किंतु पश्चात् उन्होंने युद्ध की वीभत्सता को जब निकट से देखा, तब युद्ध के प्रति घृणा का भाव प्रदर्शित करने लगे और मानवता के आदर्श का प्रतिपादन उनकी रचनाओं में विशेष रूप से व्यक्त होने लगा। उनकी कविताएँ मौलिक शैली से युक्त और प्रभावशाली हैं। हर्बर्ट यूलेन बर्ग ने जहाँ जर्मन रंगमंच की उन्नति के लिए लोकप्रिय सुंदर नाटकों की रचना की, वहाँ मनोवैज्ञानिक, भावनायुक्त और नूतन शैली से परिपूर्ण कविताओं द्वारा आधुनिक जर्मन काव्य को संपन्न किया। काव्य-कला की दृष्टि से उन्होंने उत्कृष्ट कोटि की कविताएँ लिखी हैं।

इस समय के अन्य महत्त्वपूर्ण प्रतिभाशाली कवियों में फ्राँज़ वरफेल, वॉलमोलर, वाल्टर वान शोल्ज़ और पाल आंर्स्ट मुख्य हैं। इन कवियों के समय में जर्मनी में नाजीवाद की स्थापना के पूर्व की राजनीतिक चेतना का विकास शक्तिशाली रूप में उत्पन्न हो चुका था और उग्र राष्ट्रीयता के विचारों का प्रचार होने लगा था। जर्मन जाति में पुनरुत्थान और चरम शक्तिशाली रूप में उठ खड़े होने की भावना जाग्रत होने लगी थी। फलस्वरूप साहित्य पर भी राजनीतिक विचारों का प्रबल प्रभाव पड़ने लगा। उस जागृति के युग में साहित्य ने भी अपनी दिशा बदली और वह भी नीत्शे के क्रांतिकारी सिद्धांतों के आधार पर संसार में केवल जर्मन जाति की ही सर्वश्रेष्ठता का समर्थन करने लगा और संसार में जर्मन साम्राज्य के प्रसार की आवश्यकता पर बल देने लगा। साहित्य के अन्य अंगों की भाँति कविताओं ने भी अपना स्वर बदल दिया और काव्य की विशेषताओं एवं परिभाषा में रूपांतर हो गया। यही कारण है कि इन कवियों की प्रारंभिक कविताओं में जो श्रेष्ठता पाई जाती है, वह उनकी परवर्ती काल की रचनाओं में नहीं मिलती। फलस्वरूप काव्य का स्वाभाविक सौंदर्य निष्प्रभ होने लगा।

हिटलर के निरंकुश शासन-काल में साहित्य में युगांतरकारी परिवर्तन हुआ और कविता में भी घृणा, द्वेष, प्रतिशोध एवं साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षा के प्रमाद की भावनाओं ने एकाधिपत्य स्थापित कर लिया। इस समय कविताओं में यहूदियों के विरुद्ध घृणा और प्रतिशोध की भावनाओं को विशेष स्थान मिला। इस प्रकार के कई कविता-संग्रह प्रकाशित हुए, जिनमें से ‘Deutschland Erwache’ (जर्मनी जाग) नामक कविता संग्रह बहुत प्रसिद्ध है। इसके गीतों का एक मात्र उद्देश्य जर्मनी में यहूदियों के विरुद्ध मनोभाव जाग्रत करना था। इस प्रकार तत्कालीन साहित्य-सृजन द्वारा शक्तिशाली और व्यापक प्रचार किया गया। इस समय के साहित्य का उद्देश्य मानवता-विरोधी और विश्व-शांति को युद्धाग्नि में झोंकना था। फलस्वरूप लाखों की संख्या में यहूदी जाति का निर्यातन हुआ। साम्यवाद के विरुद्ध विषाक्त प्रचार किया गया। युद्धारंभ हुआ और फ्रांस समेत समस्त मध्य यूरोप पर जर्मनी ने शक्तिशाली आक्रमण किया, किंतु सोवियत रूस ने स्टालिनग्राड तक पीछे हटकर अपनी संपूर्ण शक्ति से प्रत्याक्रमण कर जर्मनों को वापस बर्लिन तक धकेल दिया। दूसरी ओर से अमेरिका और ब्रिटेन ने यूरोप को मुक्त करना प्रारंभ कर दिया। अंत में फ्रांस, बेल्जियम, हालैंड, नार्वे, डेनमार्क, ग्रीस आदि देश जर्मनों से मुक्त करा लिए गए। जर्मनी पर सोवियत रूस, अमेरिका, फ्रांस तथा ब्रिटेन ने अधिकार कर लिया और हिटलर ने आत्मघात कर लिया। जर्मनी को इस अर्द्ध-शताब्दी में ही पुन: पराजित होना पड़ा।

वर्तमान जर्मन कविता की प्रगति पराजयवादी भावना से ओतप्रोत है। केवन कुछ जर्मन साहित्यकार ही विदेशों में भागकर जर्मन भाषा में साहित्य सृजन करते रहे। इनमें प्रसिद्ध फ्रेडरिक बरर्शल और अलफ्रेड केर्र भी थे, जो नाजीवाद के विरोधी थे। उनकी तत्कालीन मानवतावादी कविताएँ अतीव सुंदर हैं। जिन जर्मन साहित्यकारों को नाजियों ने जर्मनी में ही मार डाला था, उनमें प्रसिद्ध कवि मुशाम थे, जिन्हें कंसेंट्रेशन कैंप में असह्य यंत्रणाएँ देकर समाप्त कर दिया गया था।

युद्धोतर जर्मनी की वर्तमान कविता का रूप निराशावाद, पश्चात्ताप, दरिद्रता, दुर्दशा और महानाश के फलस्वरूप उत्पन्न महावेदना से आच्छादित है। हाल ही में जर्मन कवि वर्गेन ग्रुएन का कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है, जिसका नाम ‘Dies Irai’ (देवता का रोष) है। इसकी कविताओं में असह्य दु:ख, जर्जरित जर्मन जाति के सजीव मर्मस्पर्शी चित्र अंकित किए गए हैं। इस संग्रह की कविताओं में ‘शेष आविर्भाव’, ‘प्रतीक्षा में’, ‘रुद्र का आविर्भाव’, ‘ईसा की वाणी’, ‘दांते के प्रति’, ‘प्रतिकार’, ‘प्रायश्चित’ तथा ‘पृथ्वी के जन-गण के प्रति’ आदि कविताएँ अत्यंत प्रभावपूर्ण तथा मार्मिक हैं।

उक्त संग्रह की कविताओं से प्रतीत होता है कि वर्तमान जर्मन जनता की वास्तविक दुर्दशा-ग्रस्त स्थिति और मनोदशा का रूप कैसा करुण है और उसकी चिंतन-धारा किस दिशा की ओर प्रभावित हो रही है। प्राय: सभी कविताओं में प्रायश्चित भावना और कष्ट सहन के लिए शक्ति, साहस तथा अशांत हृदय के लिए ईश्वर से शांति प्रदान करने की कामना की गई है। इस समय की जर्मन कविता का जो रूप है, वह वास्तव में अस्थाई है। भविष्य में जो रूप निर्धारित होगा, वह राजनीतिक स्थिति के परिवर्तन के आधार के अनुसार ही होगा। वास्तव में आजकल की जर्मन कविता का क्षीण स्वर आहत जर्मन जनता की ‘आह’ के रूप में प्रतिध्वनित हो रहा है।

गौरीशंकर ओझा द्वारा भी